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Article: श्रेणी ने इंसान को दरिद्र और वर्ण ने इंसान को दलित बना दिया बाबा साहेब अम्बेडकर

नया सवेरा नेटवर्क

आज के उत्तर आधुनिक समाज एवं विमर्शात्मक दौर में डॉ भीम राव अम्बेडकर (बाबा साहेब) एक व्यक्ति से अधिक एक विचार, एक दर्शन बन गये हैं। उनकी चेतना समता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व की एक सशक्त अभिव्यक्ति हैं, शोषितों, वंचितों एवं उपेक्षितों की आवाज़ हैं। आधुनिक समतापूर्ण समाज, सशक्त एवं समृद्ध भारत की वैचारिक नींव रखने वाले विचारक हैं डॉ अम्बेडकर। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में एक समतामूलक समाज की परिकल्पना को चरितार्थ करना एक दुष्कर कार्य था जिसे हमारे समाज के महान विद्वान, विधिवेत्ता, भाषाविद् , अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् , विचारक और धर्म-दर्शन के व्याख्याता बाबा भीमराव अंबेडकर ने साकार करने का सफल प्रयास किया। वे जानते थे कि आज से सौ साल बाद भी समतामूलक समाज के वगैर राष्ट्र का सर्वांगीण विकाश संभव नहीं है। आधुनिक भारत के समतामूलक समाज के निर्माण में बाबा साहेब के योगदान के कारण ही उनकी जयंती दिवस 14 अप्रैल को 'समानता दिवस' के रूप में मनाया जाता है। डॉ० अम्बेडकर महज़ एक व्यक्ति या विचार नहीं हैं बल्कि एक दर्शन हैं जिसे भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति में अपनाने की ज़रूरत है। आज समय की मांग है कि बाबा साहेब के विचारों को समकालीन संदर्भों में जीया एवं जाना जाए। 


आदर्श समाज संबंधित अवधारणा


प्रथम महान विचारक अपने स्वप्न का एक समाज की संरचना विकसित करता है। भक्तिकाल में देखे तो कबीर ने 'रामपुरवा' की कल्पना की तो रैदास ने 'बेगमपुरा' की जबकि तुलसीदास ने 'रामराज' की अवधारणा को लेकर आगे बढ़े। आधुनिक समय में देखें तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आदर्श समाज सत्य एवं अहिंसा पर आधारित है जिसे रामराज भी कहते हैं। वे अपने आदर्श समाज की परिकल्पना के संदर्भ में साप्ताहिक पत्रिका हरिजन में लिखते हैं - "कोई गरीब नहीं होगा, ना ही भिखारी, ना ही ऊंच, न ही नीच, नहीं करोड़पति, नहीं भूखे कर्मचारी, ना ही नशीली पेय पदार्थ, ना ही दवाइयां, महिलाओं एवं पुरुषों के लिए समान आदर होगा और पुरुष को ब्रह्मचर्य व शुद्धता की चौकसी सतर्कता से की जाएगी, जहां अस्पृश्यता नहीं होगी, और जहांँ सभी धर्म का समान रूप से आधार होगा, जहांँ सभी अभिमान एवं सम्मान से रोजी-रोटी खाने वाले होंगे।" गांधी के बरक्स अंबेडकर का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता एवं भ्रातृता पर आधारित है। मेरी दृष्टि में आदर्श समाज को लेकर बापू की परिकल्पना एक मध्यकालीन यूटोपिया की तरह लगता है, जो व्यवहारिकता एवं आदर्श यथार्थ से दूर दिखाई देता है। जबकि अंबेडकर का आदर्श समाज लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ यथार्थ के अधिक करीब है जिसे ज़मीन पर उतारना मुश्किल नहीं है। डॉक्टर अंबेडकर का आदर्श समाज बहुसांस्कृतिक, बहुभाषिक, विविधरंगी समाज के ज़्यादा करीब है जो की तार्किक अधिक है। जबकि बापू का समाज नैतिक अधिक है। समकालीन स्थिति में मुझे लगता है दोनों महापुरुषों के आदर्श समाज संबंधित मिश्रित अवधारणा को फलीभूत कर भारत को सशक्त, समृद्ध एवं पुनः वैचारिक विश्वगुरु बना सकते हैं।


धर्मिक सहिष्णुता के समर्थक


आज जब धर्म के नाम पर समाजिक सद्भावना को कट्टरता के कोठरी में संपोषित किया जा रहा है। वेशभूषा, भाषा और व्यवहार देखकर धर्म का संज्ञान लिया जा रहा है। अपराध एवं अपराधी को भी धर्म के नज़रिए से देखा जा रहा है, तब धर्म को लेकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर अक्सर कहा करते थे- "धर्म मनुष्य के लिए है ना कि मनुष्य धर्म के लिए" अर्थात मनुष्य के होने से सांस्कृतिक, धार्मिक या सामाजिक गतिविधियों का होना है, ना कि धर्म के होने से मनुष्य का होना। धर्म अगर मनुष्य के मौलिक चिंतन, आत्मिक स्वतंत्रता एवं आध्यात्मिक स्वच्छंदता के प्रचार-प्रसार को बाधित करता है तो उसे धर्म नहीं किसी पंथ विशेष का प्रोपेगेंडा ही कहा जा सकता है। बाबा साहेब के मूल चिंतन में हम बार-बार देखते हैं कि "धर्म वह है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता हो।" एक समरसतावादी, सहिष्णु एवं समावेशी समाज के निर्माण में धर्म को लोकोन्मुखी होना अनिवार्य है। धर्म में समभाव का होना उतना ही जरूरी है जितना मनुष्य में मनुष्यता का होना। कुछ वर्ग विशेष में धार्मिक कट्टरता जिस तरह से हाल के वर्षों में बढ़ी है धार्मिक असहिष्णुता के कारण राष्ट्रीय समरसता पर प्रभाव पड़ा है।


सामाजिक सहिष्णुता के घोर समर्थक

हिंदी साहित्य और भारतीय दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी भारत में जाति व्यवस्था को लेकर कहते हैं "भारत में नीच से नीच समझी जाने वाली जाति भी अपने से नीच जाति खोज लेती है।" भारत में यह उच्चता एवं निम्नता का भाव भारत की ह्यूमन कैपिटल को सैकड़ों साल से निरंतर कमजोर करती रही है। जातीय दलदल में धंसा भारतीय समाज की मुख्य चुनौतियां बेरोजगारी, अशिक्षा के साथ जातिवादी मानसिकता एवं वर्णवादी ढांचा भी है। डॉक्टर अंबेडकर भारतीय समाज को जातिविहीन एवं समरसतावादी बनाने के लिए उन्होंने अंतर्जातीय विवाह को काफी प्रोत्साहित किया, जिसकी जरूरत आज भी सर्वोच्च न्यायालय महसूस कर रही है। इस दृष्टिकोण से देखें तो भारतीय समाज में खासकर पिछड़ी एवं दलित समाज के लोग जातीय अस्मिता के नाम पर सामाजिक तथा राजनीतिक विखंडनवाद एवं अलगाववाद के शिकार ज्यादा हुए हैं। इनमें सामाजिक एकजुटता का काफी अभाव देखने को मिलता है। यही कारण है कि पिछड़ा एवं दलित समाज बहुसंख्यक होते हुए भी राजनीतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक पिछड़ेपन का शिकार रही है। मुझे लगता है जातिविहीन समाज बनाने के लिए सरकार को कुछ नियम ऐसे बनाने चाहिए जिसमें अंतर्जातीय विवाह करने वाले को सरकारी नौकरी, समाजिक सम्मान, एवं प्रतिनिधि के चुनाव में प्राथमिकता दी जाए, साथ ही सामाजिक संस्था द्वारा उन्हें सम्मानित किया जाए। जाति जैसी सामाजिक महामारी को जड़ से खत्म किए बिना एक विकसित एवं शिक्षित समाज की कल्पना करना दिन में तारे गिनना जैसा है। बाबा साहेब कहते थे "समाज को श्रेणीविहीन और वर्णविहीन करना होगा क्योंकि श्रेणी ने इंसान को दरिद्र और वर्ण ने इंसान को दलित बना दिया।"


समतामूलक समाज के प्रथम कानूनी प्रस्तोता

समतामूलक समाज के निर्माण की परिकल्पना में बाबा साहेब कहते हैं-"अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना उचित होगा।" आज जब हम समतामूलक समाज की बात करते हैं तो बाबा भीमराव अंबेडकर एवं तात्कालिक विद्वानों के द्वारा निर्मित संविधान की उद्देशिका की चर्चा करना लाजिमी हो जाता है जिसमें समतामूलक समाज के स्वरूप को बड़ी बारीकी से दर्शाया गया है। प्रस्तावना में समतामूलक समाज राष्ट्र के निर्माण में किस तरह योगदान दे सकती है इसे भी बीजतत्व के रूप में समझ सकते हैं। आप देख सकते हैं कि भारत को एक संपूर्ण, प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने तथा लोगों को सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय के लिए बाबा साहेब कटिबद्ध थे। वे विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता में विश्वास करते थे। उनके विचारों का मूल मंत्र राष्ट्र की अखंडता व एकता, बंधुत्व के आधार पर सुनिश्चित करना था। समतामूलक समाज के संदर्भ में बाबा साहेब की वह उक्ति हमें बरबस याद आती है कि "संसार की पूरी व्यवस्था मानवता पर आधारित है और प्रत्येक वस्तु एवं विचार मानव समाज से जुड़ा है।" डॉ अम्बेडकर अहिंसा को सम्पन्न समाज का आदर्श सिद्धांत मानते थे, जिस के वगैर संपन्न राष्ट्र की कल्पना करना मुश्किल है। समतामूलक समाज के निर्माण में बाबा साहेब का योगदान अविस्मरणीय है उन्होंने दलितों के साथ-साथ समाज के सभी उपेक्षित वर्गों को समाज के मुख्यधारा में लाने के लिए आजीवन संघर्षरत रहें। उन्होंने सन् 1924 में दलितों के उत्थान के लिए 'बहिष्कृत हितकारिणी सभा' की स्थापना की , सन् 1927 में 'महाड़ तालाब सत्याग्रह' चलाया, सन् 1932 में पूना पैक्ट के द्वारा दलितों को राजनीतिक समानता देने का प्रयास किया। आज जनसामान्य धारणा बन चुकी है कि बाबा साहेब केवल दलितों के उद्धारक, विचारक व राजनेता थे लेकिन मैं ऐसा बिल्कुल नहीं मानता, क्योंकि संविधान निर्माण में उनकी भूमिका व संविधान के अनुच्छेद 15 ,16 ,29 ,30,165 ,335,341  आदि को समझने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि वे राष्ट्र निर्माण के लिए समाज के सभी वर्गों को संपन्न, शिक्षित, सजग और आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे।

समतामूलक समाज व राष्ट्र निर्माण में एक बड़ी चुनौती जातिवाद है जिसे वे पूरी तरह से खत्म करना चाहते थे शायद इसी कारण उन्होंने संविधान में सामाजिक समरसता के भाव को मजबूती से दर्ज किया है । बाबा साहेब का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व पर आधारित वास्तविक धर्म की कसौटी पर सत्यापित, न्यायोचित सामाजिक व्यवस्था है। भारत बहुधर्मी, बहुभाषी, बहुजातीय एवं बहुसांस्कृति समाज है। जिसमें अनेकता में एकता दिखाई तो देती है लेकिन सभी वर्ग संगठित होकर राष्ट्र के निर्माण में अपना सर्वस्व नहीं दे रहे हैं इसलिए बाबा साहेब जातिवाद को खत्म कर राष्ट्रवाद की भावना प्रबल करना चाहते थे। हम जानते है कि जातिवाद और राष्ट्रवाद एक साथ नहीं चल सकता। जातिवाद जहां विखंडनवाद में विश्वास करता है वहीं राष्ट्रवाद अखंडता। बाबा साहेब का सपना भारत को महान, सशक्त और स्वावलंबी बनाना था। वे "एक मानव, एक मूल्य" के विचार में विश्वास रखते थे। वे चाहते थे कि देश का हर बच्चा एक समान अनिवार्य और मुफ़्त शिक्षा प्राप्त करें, जिससे राष्ट्र के निर्माण में संगठित सहयोग हो और विकास द्रुतगति से संभव हो सके।

आर्थिक साम्यवाद के उन्नायक

आज के चरम पूंजीवादी और साम्राज्यवादी समय में गरीबों और अमीरों के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। इस पूंजीवादी व्यवस्था को बाबा साहेब पहले ही भांप चुके थे इसी कारण उनका मानना था कि "यदि आर्थिक समानता नहीं लाई गई तो जनतांत्रिक व्यवस्था भी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाएगी।" उन्होंने कहा था कि एक अज्ञानी मनुष्य स्वतंत्र हो सकता है लेकिन वह अपनी स्वतंत्रता का उपयोग नहीं कर सकता जो की राष्ट्र निर्माण में सबसे बाधक तत्व है।" उनकी लड़ाई केवल समानता और आर्थिक स्वतंत्रता की नहीं थी उनका मानना था कि "मनुष्य मात्र रोटी के सहारे जीवित नहीं रह सकता, उनका एक मस्तिष्क भी होता है जिसे निरंतर विचार रूपी खुराक की जरूरत होती है।" भीमराव अंबेडकर के दौर में आर्थिक समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी अपने अनुसार व्यवसाय का चुनाव करना, आज के समय में आर्थिक आधार पर जातिवाद बहुत कम हुआ है लेकिन सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक आधार पर जातिवादी सोच अभी भी समाज को जकड़े हुए हैं। जातिवाद के पोषक अभी सक्रिय हैं लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में जातिवाद की जड़े कमजोर हुई है। हमें वर्तमान समाज एवं नई पीढ़ी पर इतना विश्वास है कि जब हम लोग आजादी का अमृत महोत्सव पूर्ण करेंगे तब हमारा समाज जातिवादी मानसिकता से बाहर निकल जाएगा। आज के नेताओं को यह समझने की जरूरत है कि राष्ट्रवाद एवं जातिवाद एक साथ चल नहीं सकता, अगर राष्ट्र का बहुमुखी एवं सर्वांगीण विकास करना है तो जातिवादी सोच को कमजोर करना होगा। इस दृष्टिकोण से वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की जाति संबंधी विचार अनुकरणीय है। जिसके अनुसार वे कहते हैं कि "देश की सबसे बड़ी जाति गरीबी, युवा बेरोजगारी, महिलाएं समस्या एवं किसान की दुर्दशा है, जिसे खत्म करने की ज़रूरत है।"

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आज की राजनीति से जिस तरह शिक्षित वर्ग एक निश्चित दूरी बनाकर रह रहे हैं इससे एक सुशिक्षित , सुव्यवस्थित एवं संगठित लोकतंत्र का भविष्य खतरे में दिख रहा है। राजनीतिक सहभागिता को लेकर बाबा साहेब अम्बेडकर कहते थे कि "राजनीति में हिस्सा ना लेना का सबसे बड़ा दंड यह है कि अयोग्य व्यक्ति आप पर शासन करने लगता है।" अत: लोकोन्मुखी लोकतंत्र की परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए शिक्षित युवा वर्ग को राजनीति में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना चाहिए। समकालीन समाज बाबा साहेब के परिकल्पनाओं का समाज तो नहीं बन पाया है लेकिन उनके पदचिन्हों से बहुत कुछ आत्मसात किया है। वर्तमान केन्द्र सरकार की कई योजनाओं एवं नारों का नाम सुनकर ऐसा लगता है बाबा साहेब के विचारों से सीधे तौर पर प्रभावित है यथा 'बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओं', 'सबका साथ सबका विकाश' आदि। आज भी हमारे समाज को बहुत सारे बाबा साहेब की ज़रूरत है तभी हम एक भारत, श्रेष्ठ भारत और सम्पन्न भारत की परिकल्पना को मूर्त रूप दे पायेंगे। जब हम विश्व गुरू बनने की बात करते हैं तो यह ध्यान रखना चाहिए कि जातिविहीन समाज, शिक्षित युवा केन्द्रित राजनीति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व ही भारत को विश्वगुरू बना सकता है ।

       बाबा भीमराव अंबेडकर के विचारों की सुदीर्घ परंपरा को हम उनके अनेक पुस्तकों के माध्यम से समझ सकते हैं। 'भारत का राष्ट्रीय' (1916) , 'भारत में लघु कृषि और उसके उपचार' (1917), 'बहिष्कृत भारत' (1927), जाति का उच्छेद(1937 ), 'शूद्र कौन और कैसे', मूक नायक, संघ बनाम स्वतंत्रता आदि आदि पुस्तकों एवं पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने भारत की जातिगत, आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं को पहचानने और खत्म करने का सुझाव देते हैं।

निष्कर्ष -

 बाबा साहेब ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें सभी महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता, सभी वर्गों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सभी व्यक्तियों में लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास और प्रत्येक मनुष्य में वसुधैव कुटुंबकम की विचारधारा विद्यमान हो। वे कहते थे कि "यदि राजनीतिक लोकतंत्र के मूल्यों में सामाजिक लोकतंत्र का आधार ना हो तो वह समाज अधिक दिनों तक नहीं बना रह सकता।" अम्बेडकर हिन्दू समाज तथा हिन्दू धर्म की उन आधारभूत मान्यताओं के विरुद्ध थे, जिसके कारण अस्पृश्यता, ऊंच-नीच जैसी संकीर्णता का जन्म होता है। उनका मानना था कि हिन्दू समाज के उत्थान के लिए जातीय बंधन समाप्त किया जाना आवश्यक है। वे समाज के विभिन्न जातियों के लोगों के मध्य अन्तर्जातीय विवाह होने लगेगा तो जाति व्यवस्था का बंधन स्वत: शिथिल होने लगेगा, क्योंकि विभिन्न जातियों के पारिवारिक संबंध बढ़ने से अपनत्व की भावना पैदा होगी।

डॉ० आर्यपुत्र दीपक

पत्रकार, संपादक- 'मानस' पत्रिका

मो०- 9450213832


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