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Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ के रसखान मीर अली मीर: डॉ. राम रतन

नया सवेरा नेटवर्क

बिलासपुर। ज्ञान किसी परिचय का मोहताज नहीं होता है । जाति धर्म समुदाय से ऊंचा उठकर एक नई आयाम स्थापित करता है इसी श्रृंखला में जब छत्तीसगढ़ी कविता की बात होती है तो मन में सहज रूप से मीर अली 'मीर' का नाम आ ही जाता है। छत्तीसगढ़ का ऐसा कवि जिनकी रचनाएँ संवेदनाओं को जगाती हैं, दिलों को छूती हैं,  लोक-जीवन की सच्चाइयों को शब्दों में ढालती हैं। शहर से हर गांव तक लोगों की जुबान ऐसे प्रतिष्ठित साहित्यकार/कवि का जन्म 15 मार्च 1953 को कवर्धा में हुआ उनका असली नाम सैयद अय्यूब अली मीर है, लेकिन साहित्यिक गलियारों में मीर अली 'मीर' के नाम से विख्यात हैं। सामाजिक मूल्यों और ग्रामीण सद्भावना को वेअपनी कविताओं में ऐसे पिरोते हैं कि श्रोता बरबस ही जुड़ जाता है। छत्तीसगढ़ी बोली की सहजता साथ ही उसमें रची-बसी जन संवेदना को हास्य, व्यंग्य, ग़ज़ल और लोकगीतों के माध्यम से अभिव्यक्त करने में उन्हें महारत हासिल है। मीर अक्सर कहते हैं, “छत्तीसगढ़ी मुझे माँ के दूध की तरह मिली,” और यह कथन मात्र एक भावुकता नहीं, बल्कि उनके गहरे भाषाई और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रमाण है। यह वही भाषा है जो उन्होंने अपनी माँ से सीखी, और अपने गाँव की मिट्टी में खेलते-बढ़ते सिखी और आत्मसात किया। उनकी कविताओं में जो सादगी है, वह कहीं भी कृत्रिम नहीं दिखाई देती है। उसमें जीवन के गहरे अनुभव और सत्य अंतर्निहित होते हैं। एक स्मृति में मीर अली मीर ने बताया कि एक बार संत पवन दीवान से हमने कविता मांगी तो वे खिसिया गए.... उन्होंने कहा कि तुम 11 वीं कक्षा में पढ़ते हो और खुद नहीं लिख सकते कल 4 लाइन लिखकर आना।उसके बाद हमने प्रयास किया तब से अब तक अनवरत 1971 से कलम चल रही है। यही कारण है कि संत पवन दीवान को मीर अली मीर अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं।  प्रारंभिक शिक्षा कवर्धा से की और आगे की पढ़ाई  बी.ए. और सी.पी.एड. के लिए रायपुर गए। साहित्य जगत में प्रसिद्ध एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय के. विभूषण ने उन्हें 'छत्तीसगढ़ का रसखान' कहकर संबोधित किया है।आकाशवाणी और दूरदर्शन में लगातार 30 वर्षों से काव्य पाठ सैकड़ों अखिल भारतीय मंचों पर प्रस्तुति ,राज्य उत्सव ,चक्रधर,जाज्वल्य देव महोत्सव,भोरम देव महोत्सव के साथ साथ अनगिनत कवि सम्मेलनों के मंच पर छोटे बड़े कवियों के साथ मंच साझा करते रहे हैं। मीर अली मीर की रचनाओं में छत्तीसगढ़ की मिट्टी की ख़ुशबू है, लुप्त होती संस्कृति-परंपराओं के संरक्षण में अपनी आवाज़ बुलंद की है। आपका गीत "नंदा जाही का रे ..... देश विदेश में बसे छत्तीसगढ़ के लोगों को उनकी विरासत से जोड़ता है। छत्तीसगढ़ में बन रही फिल्मों के लिए आपने कई गीत लिखे हैं, जिसमें राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त "भूलन द मेज़ भी शामिल है इस गीत में आपकी सुप्रसिद्ध रचना नंदा जाही का रे के अलावा अमावस के देहरी म दिया कस अँजोर ददरिया गीत शामिल है। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ़िल्म छत्तीसगढ़ के भीम ,दस्तावेज में भी आपके गीत हैं, सारेगामा छत्तीसगढ़ में आपके गीत मोर छत्तीसगढ़ महतारी को पद्मश्री अनुज शर्मा ने स्वर दिया है। शासन की योजनाओं में प्रचार-प्रसार के लिए भी आपने गीत लिखे हैं।इसके साथ ही समाज में व्याप्त बुराइयों के बारे में भी आपने गीत और कविताओं के माध्यम से जागरूकता करने का प्रयास सराहनीय हैं। गौ रक्षा ,बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, आपके गीत समाज के हर तबके के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। 

मीर अली 'मीर' को उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं.उन्हें पंडित सुंदरलाल शर्मा राज्य पुरस्कार, राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 2019 में छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी कई पुस्तकें और कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध करने में बड़ी भूमिका निभाई है। वर्तमान में वे अरुण चौरा नामक साहित्यिक पत्रिका का संपादन के साथ चेतना कला साहित्य परिषद का संचालन भी कर रहे हैं, जो स्थानीय रचनाकारों को एक सार्थक मंच उपलब्ध कराती है।


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 मीर अली 'मीर' का साहित्यिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार एक कवि समाज की आत्मा से जुड़कर अपनी भाषा और संस्कृति को जीवंत बना सकता है उनकी उपस्थिति न केवल सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का मार्ग भी प्रशस्त करती है। डॉ. राम रतन श्रीवास 'राधे राधे' (ब्रांड एंबेसडर भारत-नेपाल पशुपतिनाथ अंतर्राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव काठमांडू नेपाल) कहते हैं कि यदि छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति को नजदीक से जानना है तो मीर अली मीर की कविताएं पढ़ना और सुनने के साथ चिंतन करना चाहिए। उन्होंने विलुप्त होती ग्रामीण जीवन की संस्कृति पर बहुत ख़ूबसूरती से लिखा है। उनकी प्रतिनिधि रचना नंदा जाहि एक चिंतन का गीत है  का सटीक उदाहरण है जिसमें उन्होंने बड़ी बारीकी से गांव का चित्रण किया है। इस गीत को सुनकर आँखों में आंँसू और दिल में अपनी संस्कृति के लिए प्रेम सहज रूप से उमड़आता है। बेटी बचाओ अभियान,मतदाता जागरूकता , हर घर तिरंगा आभियान, नशामुक्ति अभियान में उन्होंने अपनी आवाज से हर विषय पर चित्रण है। मीर अली मीर हिंदी, छत्तीसगढ़ी और उर्दू के भी अच्छे जानकार हैं लेकिन छत्तीसगढ़ी बोली भाषा उनके दिल में बसती है। उनके लिखे  प्रत्येक गीत एवं भजन इतने मधुर हैं।उन्होंने राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय मंचों पर प्रस्तुति दिया है। ऐसे महान साहित्यकार का आज जन्म दिवस के शुभ अवसर पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं मीर अली मीर जी के जीवन में सदैव सुख ,शांति, समृद्धि आरोग्य और उज्जवल भविष्य की  मंगल कामना के साथ पुनः ढेरो बधाई।

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