Jaunpur News: इमोशनल डम्पिंग: रिश्तों पर बोझ या राहत का साधन
नया सवेरा नेटवर्क
जौनपुर। बदलते समय और तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के बीच इंसान अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में असमर्थ होता जा रहा है। काम का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, रिश्तों की उलझनें और व्यक्तिगत असफलताएँ मनुष्य के भीतर भावनात्मक तनाव पैदा करती हैं। जब यह तनाव ज़्यादा हो जाता है तो लोग अक्सर अपने करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों या सहकर्मियों पर अपनी नकारात्मक भावनाएँ उंडेलने लगते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में इसे इमोशनल डम्पिंग (Emotional Dumping) कहा जाता है।
क्या है इमोशनल डम्पिंग?
इमोशनल डम्पिंग का मतलब है अपनी भावनाओं को असंतुलित और अनियंत्रित तरीके से दूसरे व्यक्ति पर थोप देना। यह सामान्य बातचीत से अलग होता है क्योंकि इसमें बोलने वाला सिर्फ अपनी बात कहता है, वह सामने वाले की स्थिति, मनोदशा या इच्छा का ख्याल नहीं रखता। कई बार लोग लगातार शिकायतें, दुख, गुस्सा या तनाव दूसरों पर उड़ेलते हैं, जिससे सुनने वाला थकान और बोझिलपन महसूस करने लगता है।
क्यों होता है इमोशनल डम्पिंग?
1. तनाव और चिंता – आधुनिक जीवन की व्यस्तता और प्रतिस्पर्धा इंसान को भीतर से असुरक्षित बना देती है।
2. सपोर्ट सिस्टम की कमी – परिवार या दोस्तों से खुलकर बातचीत न कर पाने के कारण व्यक्ति अचानक किसी भी उपलब्ध व्यक्ति पर अपनी भावनाएँ उंडेल देता है।
3. सहानुभूति की खोज – लोग चाहते हैं कि कोई उन्हें सुने और समझे, लेकिन तरीका गलत हो जाता है।
4. भावनात्मक जागरूकता की कमी – व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि कब और कितना साझा करना उचित है।
रिश्तों पर असर
इमोशनल डम्पिंग सुनने वाले और बोलने वाले दोनों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।
लगातार इमोशनल डम्पिंग रिश्तों में असंतुलन पैदा करता है।
सुनने वाला व्यक्ति खुद को थका हुआ, बोझिल और कभी-कभी इस्तेमाल किया हुआ महसूस करता है।
धीरे-धीरे संवाद में संतुलन टूट जाता है और रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है।
कार्यस्थल पर यह आदत टीम की कार्यक्षमता और आपसी सहयोग को भी प्रभावित करती है।
क्या हमेशा बुरा है इमोशनल डम्पिंग?
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जरूरी नहीं कि भावनाओं को साझा करना हमेशा नकारात्मक हो। इंसान को अपनी भावनाएँ व्यक्त करनी चाहिए, लेकिन यदि यह आदत बन जाए और हर बातचीत शिकायत या दुख का पिटारा बनकर सामने आए, तो यह दूसरों के लिए बोझ साबित हो सकता है। संतुलन और सही समय का ध्यान रखना जरूरी है।
इससे बचने के तरीके
1. सेल्फ-अवेयरनेस बढ़ाएँ – यह समझें कि आपकी बातें सामने वाले को कितना प्रभावित कर रही हैं।
2. सही समय और व्यक्ति चुनें – हर कोई आपकी बात सुनने के लिए तैयार नहीं होता। सही जगह और सही समय का चुनाव करें।
3. सकारात्मक संवाद सीखें – केवल शिकायतें करने के बजाय समाधान पर बात करें।
4. सीमाएँ तय करें – यदि आप सुनने वाले की भूमिका में हैं, तो धीरे-धीरे स्पष्ट करें कि हर समय शिकायतें सुनना संभव नहीं है।
5. मनोवैज्ञानिक सलाह लें – यदि भावनात्मक बोझ बहुत गहरा है, तो मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से बात करना ज्यादा उपयोगी होता है।
समाज के लिए संदेश
आज जब हर कोई तनाव और दबाव से गुजर रहा है, तब भावनात्मक संतुलन बनाए रखना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है। हमें यह सीखने की आवश्यकता है कि अपनी भावनाओं को कैसे और किस हद तक व्यक्त किया जाए। इमोशनल डम्पिंग को यदि सही तरीके से नियंत्रित किया जाए, तो रिश्तों में मधुरता बनी रह सकती है और संवाद स्वस्थ दिशा में आगे बढ़ सकता है।
डॉ. ममता सिंह, मनोविज्ञान विभाग, मोहम्मद हसन पी.जी. कॉलेज, जौनपुर।