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Poetry: चार दिनों का मेला है.....!

नया सवेरा नेटवर्क

चार दिनों का मेला है.....!


बारिशों ने इस बार....!

कुछ अजब सा खेल खेला है...

मानो या मत मानो...

इस वरस....खुद ही उन्होंने....

बूँदों का मोह छोड़ा है....

अब तलक...लेकर भार जिनका..

कर रहे थे देशाटन...जी भर का...

जाने क्यों...उचट गया उनसे...?

मन आवारा बादलों का....

और....पूरी शिद्दत से उन्होंने....

अपने जिगर को धरा पर उड़ेला है

तपती धारा को उम्मीद ना थी....!

ऐसी नियामत की प्यारे....

फिर बात क्यों उठती....?

मन में उसके किसी कयामत की..

जब तलक समझ पाती....!

धरा कुछ भी प्यारे....

कलेजे पर अपने....

बाढ़ का थपेड़ा झेला है....

इसी में बह गए सारे...

मकाँ,जानवर,पेड़-पौधे...और...

आदमी-औरत-बच्चे भी प्यारे.....

समझ नहीं पा रहा है कोई यहाँ...

कि यह कैसा झमेला है....?

बदनसीबी कहता इसे कोई,

कहता कोई इच्छा प्रभु की प्यारे..

कोई दोष देता....है मनुज का...

जिसने....जानबूझकर....!

इस प्रकृति को छेड़ा है.....

संदर्भ,प्रसंग और व्याख्या है यहाँ सबकी...अपनी-अपनी प्यारे...

पर मानता है हर कोई यही कि...!

जादूगर,इस सृष्टि का....अकेला है

और खेल उसके हैं...बेहद निराले

वास्तव में...हिस्सा है यह बाढ़ भी

उसके....खेल ही का प्यारे.....

नहीं कुछ इसमें नया खेल खेला है

बस इतना जताना चाहता है वह...

कि जिंदगी तो बस....!

चार दिनों का मेला है....

कि जिंदगी तो बस....!

चार दिनों का मेला है....


रचनाकार.....

जितेन्द्र कुमार दुबे

अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ


एलआईसी के अभिकर्ता विनोद यादव की तरफ से श्रावण मास, स्वतंत्रता दिवस, नागपंचमी और रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
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