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समाज के माथे पर कलंक–“अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो”

–डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार

नया सवेरा नेटवर्क

आज सुबह जैसे ही हाथ में नवभारत टाइम्स का अखबार लिया, एक मार्मिक शीर्षक ने मन को भीतर तक झकझोर दिया —

“अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो…”


यह केवल एक पंक्ति नहीं थी, यह उन असंख्य बेटियों की मौन चीख थी, जो दहेज जैसी कुप्रथा की भेंट चढ़ जाती हैं।

33 वर्षीय टि्वशा  शर्मा और 25 वर्षीय दीपिका…

दो नाम नहीं, दो अधूरे सपने थे।

दो जिंदगियाँ थीं, जिन्हें जीने का पूरा अधिकार था।

लेकिन दहेज की प्रताड़ना ने उन्हें इस हद तक तोड़ दिया कि उनकी जिंदगी खत्म हो गई।


यह हत्या थी या आत्महत्या — यह तो जांच का विषय है,

लेकिन इतना तय है कि जिन लोगों ने एक लड़की को अपने जीवन से हाथ धोने पर मजबूर कर दिया, वे किसी भी रूप में दोषी हैं।

ऐसे दरिंदों को कठोर से कठोर सजा मिलनी ही चाहिए।

क्योंकि किसी इंसान को मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित कर देना कि वह जीने की इच्छा ही खो दे, यह भी किसी हत्या से कम नहीं।


यह समाचार पढ़कर मन में एक ही प्रश्न उठता है —

क्या सचमुच हम 21वीं सदी में जी रहे हैं?


आज महिलाएँ युद्ध क्षेत्र में देश की रक्षा कर रही हैं, अंतरिक्ष में भारत का परचम फहरा रही हैं, विज्ञान, राजनीति, साहित्य, खेल और व्यापार हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं।

फिर भी, उसी समाज में एक बेटी को विवाह के बाद दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है, जलाया जाता है, अपमानित किया जाता है।

यह केवल अपराध नहीं, मानवता की हार है।


सबसे दुखद बात यह है कि दहेज मांगने वाले घरों में भी बहनें और बेटियाँ होती हैं।

फिर क्यों किसी और की बेटी को केवल पैसों और सामान के लिए यातना दी जाती है?

क्या रिश्तों की कीमत अब रुपयों से तय होगी?

क्या बहू अब इंसान नहीं, बल्कि मायके से सामान और धन लाने वाली एक “बैंक” बनकर रह गई है?

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दहेज कभी किसी का जीवन नहीं चला सकता।

जीवन चलता है संस्कारों से, प्रेम से, सम्मान से और परिश्रम से।

भगवान ने सबको हाथ-पैर दिए हैं, शिक्षा दी है, क्षमता दी है —

तो फिर किसी बेटी के पिता की मेहनत की कमाई पर अपना अधिकार क्यों?


आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, सोच बदलने की है।

माता-पिता को भी चाहिए कि वे केवल “अच्छा घर” या ऊँचा दिखावा देखकर जल्दबाजी में बेटी का विवाह न करें।

रिश्तों की चमक-दमक से ज्यादा जरूरी है उस परिवार की मानसिकता को समझना।

दहेज के लालचियों की पहचान अक्सर शादी से पहले ही हो जाती है ।

कभी महंगे उपहारों की अपेक्षा में,

कभी बार-बार की मांगों में,

तो कभी तानों और व्यवहार में।


ऐसे समय में डरना नहीं चाहिए।

जरूरत पड़े तो सगाई तोड़ देनी चाहिए।

और यदि विवाह मंडप तक बात पहुँच जाए, तब भी हिम्मत करके बारात लौटा देनी चाहिए।

क्योंकि एक टूटा रिश्ता फिर भी जीवन बचा सकता है,

लेकिन गलत घर में की गई शादी पूरी जिंदगी बर्बाद कर देती है।


समाज को यह समझना होगा कि बेटी कोई बोझ नहीं, वह घर की सबसे सुंदर रचना है।

जिस घर में बेटियों का सम्मान नहीं, वह घर कभी सुखी नहीं हो सकता।


आइए संकल्प लें —

न दहेज देंगे,

न दहेज लेंगे,

और न ही दहेज मांगने वालों का समर्थन करेंगे।


ताकि फिर कभी किसी अखबार की हेडिंग यह न कहे —

“अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो…”।


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