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Jaunpur News: अंधविश्वास नहीं, न्यूरोकेमिकल असंतुलन के कारण होती है शिजोफ्रेनिया बीमारी, सही इलाज से सामान्य जीवन संभव: डॉ. हरि नाथ यादव

विश्व शिजोफ्रेनिया दिवस पर श्री कृष्णा न्यूरो एवं मानसिक रोग चिकित्सालय में संगोष्ठी का आयोजन

नया सवेरा नेटवर्क

जौनपुर। विश्व शिजोफ्रेनिया दिवस के अवसर पर नई गंज, जौनपुर स्थित 'श्री कृष्णा न्यूरो एवं मानसिक रोग चिकित्सालय' में एक मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी के मुख्य वक्ता चिकित्सालय के प्रबंध निदेशक एवं वरिष्ठ न्यूरो-साइकियाट्रिस्ट डॉक्टर हरि नाथ यादव (MBBS, MD) रहे, जिन्होंने उपस्थित जनसमुदाय, स्वास्थ्य कर्मियों तथा मरीजों के परिजनों को शिजोफ्रेनिया जैसी गंभीर बीमारी के बारे में विस्तार से बताया और इस मानसिक विकार के प्रति समाज को जागरूक किया।

समाज में शिजोफ्रेनिया को लेकर फैली भ्रांतियों और मिथकों पर बात करते हुए डॉ. हरि नाथ यादव ने कहा कि सबसे बड़ा मिथक यह है कि लोग इसे ऊपरी हवा का चक्कर, भूत-प्रेत का साया या कोई तांत्रिक प्रकोप मान लेते हैं और मरीज को ओझा-सोखा के पास ले जाते हैं। सच्चाई यह है कि शिजोफ्रेनिया कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि दिमाग के रसायनों (न्यूरोकेमिकल्स जैसे डोपामाइन) के असंतुलन से होने वाली एक विशुद्ध मेडिकल कंडीशन है। उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि दूसरा मिथक यह है कि शिजोफ्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति हमेशा हिंसक या पागल हो जाता है, जबकि असलियत यह है कि सही देखरेख मिलने पर ये मरीज बेहद शांत रहते हैं। वहीं तीसरा मिथक यह है कि यह बीमारी कभी ठीक नहीं हो सकती, जबकि वैज्ञानिक सच यह है कि सही समय पर इलाज मिलने से मरीज पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकता है।

शिजोफ्रेनिया के लक्षणों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए डॉ. यादव ने बताया कि इसकी समय पर पहचान ही बचाव का पहला रास्ता है। इसके मुख्य लक्षणों में मरीज को ऐसी डरावनी या अजीब आवाजें सुनाई देती हैं जो हकीकत में होती ही नहीं हैं, जिसे मेडिकल भाषा में हेलुसिनेशन कहते हैं। इसके अलावा मरीज के मन में बिना वजह पक्के शक पैदा हो जाते हैं, जैसे कि कोई उसके खिलाफ साजिश रच रहा है या उसके खाने में जहर मिला रहा है, जिसे डेल्यूजन कहा जाता है। इस बीमारी में मरीज अचानक समाज और परिवार से पूरी तरह कट जाता है, खुद से ही अकेले में बुदबुदाता या हंसता रहता है, नहाने-धोने या साफ-सफाई पर ध्यान देना बंद कर देता है, और उसकी भावनाओं तथा बातचीत का तरीका पूरी तरह असंगत और अजीब हो जाता है।

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इसके मुकम्मल इलाज और समाधान के बारे में बताते हुए डॉ. हरि नाथ यादव ने कहा कि आधुनिक न्यूरो-साइकियाट्री में अब अत्यंत प्रभावी एंटी-साइकोटिक्स दवाइयां मौजूद हैं जो दिमाग के रसायनों को संतुलित करती हैं। दवाओं के साथ-साथ थेरेपी और काउंसलिंग मरीज की सोच को सकारात्मक दिशा देने में रीढ़ की हड्डी का काम करती है। मरीज को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए 'पुनर्वास' (Rehabilitation) और उसे रचनात्मक कार्यों से जोड़ना बेहद जरूरी है ताकि वह आत्मनिर्भर होकर गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सके।

इस जागरूकता कार्यक्रम के अवसर पर डॉक्टर सुशील, नितिन, शिव बहादुर, लाल जी एवं समस्त हॉस्पिटल स्टाफ , मरीज एवं उनके परिजन मुख्य रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ प्रतिमा यादव ने उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित करते हुए शिजोफ्रेनिया के मरीजों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार रखने की अपील की, उपस्थित सभी लोगों को जागरूक होने के लिए बधाई दी और कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी का हृदय से धन्यवाद ज्ञापित किया।

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