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Hyderabad News: पार्टनर्स को मिलने वाले फ़ायदों पर नया टीडीएस नियम : सीए मधुसूदन अग्रवाल

नया सवेरा नेटवर्क

हैदराबाद। पार्टनरशिप फ़र्मों और लिमिटेड लाइबिलिटी पार्टनरशिप (LLP) से जुड़े पार्टनर्स के लिए सरकार ने टैक्स अनुपालन को सख़्त बनाने की दिशा में एक अहम बदलाव किया है। आयकर अधिनियम की धारा 194T के तहत यह नया TDS प्रावधान फ़ाइनेंशियल ईयर 2025-26 से लागू होगा। हाल के समय में यह पाया गया कि कई पार्टनर्स अपनी फ़र्मों से मिलने वाली आय—जैसे मेहनताना, कमीशन या ब्याज़—को अपने व्यक्तिगत आयकर रिटर्न में सही तरीके से नहीं दिखा रहे थे या रिटर्न दाखिल ही नहीं कर रहे थे। इसी को ध्यान में रखते हुए यह नियम लाया गया है ताकि ऐसी आय पर नज़र रखी जा सके और टैक्स सिस्टम में पारदर्शिता लाई जा सके। यह जानकारी सीए मधुसूदन अग्रवाल ने दी।

उन्होंने बताया कि इस नए प्रावधान के तहत अब फ़र्मों—चाहे वे पारंपरिक पार्टनरशिप हों या LLP—को अपने पार्टनर्स को किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के भुगतानों पर TDS काटना अनिवार्य होगा। इनमें मेहनताना (remuneration), बोनस, कमीशन, कैपिटल या लोन पर ब्याज़ तथा किसी भी अन्य नाम से दिया गया लाभ शामिल है। TDS उस समय काटा जाएगा जब राशि पार्टनर के खाते (जिसमें कैपिटल अकाउंट भी शामिल है) में क्रेडिट की जाती है या जब वास्तविक भुगतान किया जाता है—इन दोनों में से जो भी पहले हो।

श्री अग्रवाल ने बताया कि TDS की सामान्य दर 10 प्रतिशत निर्धारित की गई है, जबकि यदि पार्टनर अपना PAN उपलब्ध नहीं कराता है तो यह दर बढ़कर 20 प्रतिशत हो जाती है। यदि पूरे वित्त वर्ष में किसी पार्टनर को कुल भुगतान ₹20,000 से अधिक नहीं है, तो TDS काटने की आवश्यकता नहीं होगी। रेज़िडेंट पार्टनर्स के मामले में कोई सरचार्ज या सेस लागू नहीं होगा, जबकि नॉन-रेज़िडेंट पार्टनर्स के लिए धारा 195 के प्रावधान लागू हो सकते हैं, जिनमें अलग दरें और अतिरिक्त अनुपालन शामिल हो सकते हैं।

उन्होंने बताया कि यह भी समझना आवश्यक है कि हर भुगतान पर TDS लागू नहीं होगा। जैसे कि पार्टनर द्वारा डाली गई पूंजी की निकासी (capital withdrawal), ऋण की वापसी, फ़र्म के लाभ का हिस्सा (profit share) तथा फ़र्म की ओर से किए गए वास्तविक व्यावसायिक खर्चों की प्रतिपूर्ति (reimbursement) को आय नहीं माना जाता, इसलिए इन पर TDS नहीं लगेगा।

श्री अग्रवाल ने बताया कि अनुपालन के लिहाज़ से फ़र्मों को अब कई ज़िम्मेदारियाँ निभानी होंगी। उन्हें टैक्स डिडक्शन एंड कलेक्शन अकाउंट नंबर (TAN) प्राप्त करना होगा, TDS को निर्धारित समय-सीमा के भीतर जमा करना होगा—जो सामान्यतः अगले महीने की 7 तारीख तक होती है (मार्च के मामलों में 30 अप्रैल तक)—और त्रैमासिक TDS रिटर्न (फॉर्म 26Q) दाखिल करनी होगी। साथ ही, पार्टनर्स को फॉर्म 16A के माध्यम से TDS प्रमाणपत्र भी जारी करना होगा।

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उन्होंने बताया कि यदि कोई फ़र्म इन नियमों का पालन नहीं करती है, तो उस पर कड़े दंड लगाए जा सकते हैं। TDS न काटने पर 1 प्रतिशत प्रति माह और जमा न करने पर 1.5 प्रतिशत प्रति माह की दर से ब्याज देना पड़ सकता है। इसके अलावा, संबंधित खर्च का 30 प्रतिशत तक अस्वीकार किया जा सकता है, TDS राशि के बराबर जुर्माना लगाया जा सकता है, और देर से रिटर्न दाखिल करने पर ₹200 प्रतिदिन का शुल्क भी देना पड़ सकता है। गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई भी संभव है।

श्री अग्रवाल ने बताया कि स्पष्ट है कि धारा 194T का यह नया प्रावधान पार्टनरशिप फ़र्मों और उनके पार्टनर्स के लिए एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। ऐसे में सभी संबंधित पक्षों को चाहिए कि वे समय रहते इन नियमों को समझें और पूरी तरह अनुपालन सुनिश्चित करें, ताकि अनावश्यक दंड और कानूनी जटिलताओं से बचा जा सके।

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