Article : पुरुषोत्तम मास का पौराणिक महत्व विशेष
बिपिन सैनी @ नया सवेरा
पुरुषोत्तम मास (जिसे 'अधिक मास' या 'मलमास' भी कहते हैं। हर तीसरे वर्ष आने वाला एक पवित्र अतिरिक्त चंद्र मास है।इस बार यह महीना 17 मई से लग रहा है।यह महीना भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त है। यह मास आत्म-शुद्धि, व्रत, और दान-पुण्य के लिए अत्यंत श्रेष्ठ कल्याणकारी माना जाता है। जिसमें किए गए अच्छे कर्मों का फल कई गुना अधिक मिलता है पुरुषोत्तम मास का पौराणिक महत्व पौराणिक कथाओं के अनुसार अधिक मास में सूर्य की संक्रांति न होने के कारण इसे मलिन (मल मास) मान लिया गया था। इस उपेक्षित महीने ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, तब भगवान ने इसे अपना स्वयं का नाम 'पुरुषोत्तम' प्रदान किया। 'पुरुषोत्तम' का अर्थ होता है- सभी में सर्वोत्तम। भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि इस महीने में किए गए जप, तप, दान और व्रत से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।यह मास सांसारिक और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति वाले कर्मों, जैसे- विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यवसाय के आरंभ के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। इसे पूर्ण रूप से आध्यात्मिक साधना और निस्वार्थ कर्मों को समर्पित किया जाता है।“हर 32 महीने में एक अतिरिक्त महीना पुरुषोत्तम मास आता है पुरुषोत्तम मास का रहस्य।
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भारत की पारंपरिक पंचांग प्रणाली केवल तिथियों का हिसाब नहीं रखती बल्कि सूर्य चंद्रमा और ऋतु चक्र के संतुलन को भी बनाए रखती है। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए समय-समय पर अधिक मास आता है।हिंदू पंचांग मुख्य रूप से चंद्रमा पर आधारित होता है। एक चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है, जबकि सूर्य वर्ष लगभग 365 दिन का होता है।
यानी हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर बनता है। जब यह अंतर लगभग 29–30 दिन तक पहुंच जाता है तब पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है इसे अधिक मास कहते हैं। इसी कारण यह लगभग हर 32 महीने 16 दिन के आसपास आता है।पुराणों के अनुसार इस अतिरिक्त महीने को पहले कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता था।तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” कहा।इसलिए इसे भक्ति जप दान साधना आत्मशुद्धि का विशेष महीना माना जाता है। स्कंद पुराणऔर पदम् पुराण में पुरुषोत्तम मास का महत्व विस्तार से बताया गया है। वही हिंदू पंचांग में तिथि चंद्रमा की स्थिति से मास अमावस्या/पूर्णिमा चक्र से संक्रांति सूर्य के राशि परिवर्तन से निर्धारित होते हैं।
अधिमास तब माना जाता है जब किसी चंद्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती तब वह महीना अधिक मास कहलाता है। उदाहरण के लिए यदि एक चंद्र मास के दौरान सूर्य नई राशि में प्रवेश नहीं करे तो वही मास “अधिक” माना जाता है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से अधिमास आयुर्वेद में ऋतु, चंद्रमा और शरीर के संबंध को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। अधिमास को मानसिक शांति इंद्रिय संयम सात्त्विक आहार अग्नि संतुलन दिनचर्या सुधार के लिए श्रेष्ठ समय माना जाता है।इस दौरान पारंपरिक रूप से लोग हल्का भोजन उपवास ध्यान ब्रह्मचर्य दान-पुण्य पर अधिक ध्यान देते हैं। आयुर्वेद के अनुसार नियमित उपवास और संयम पाचन अग्नि को संतुलित करने मानसिक स्थिरता बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं। अधिमास में पारंपरिक रूप से जप और ध्यान भगवद गीता पाठदान-पुण्य सात्त्विक भोजन संयमित दिनचर्या तीर्थ और पूजा पाठ पूजन करना शुभ माना गया है। कई लोग इस समय तामसिक भोजन अधिक तेल-मसाले क्रोध आलस्य से बचने का प्रयास करते हैं।
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