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पुस्तक समीक्षा : सनातन धर्म : सभी प्रौद्योगिकी का सच्चा स्रोत

मानव सभ्यता का सबसे प्राचीन और पूर्ण ज्ञान है 'सनातन धर्म' 

नया सवेरा नेटवर्क

आज दुनिया भर में 'सनातन धर्म' को लेकर बहस छिड़ी हुई है। ऐसे में ''सनातन धर्म : सभी प्रौद्योगिकी  का सच्चा स्रोत'' पुस्तक के माध्यम से युवा लेखक विवान कारुलकर ने सनातन धर्म को केवल 'धर्म' नहीं बल्कि जीवन पद्धति और सार्वभौमिक ज्ञान प्रणाली बताया है। पुस्तक के लेखक का दावा है कि 'सनातन धर्म'  मानव सभ्यता का सबसे प्राचीन और पूर्ण ज्ञान है। सनातन धर्म = विज्ञान + दर्शन + जीवनशैली है। पुस्तक में वेदों को ''ज्ञान का मूल स्रोत'' बताया गया है। दावा किया गया है कि वेदों में गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा के सिद्धांत पहले से मौजूद थे। लेखक विवान कारुलकर ने अपनी पुस्तक में बताया है कि आधुनिक प्रौद्योगिकी केवल वेदों की नकल है। उनका दावा है कि आज के समय में दुनिया भर में उपयोग किए जाने   विमान (विमान शास्त्र),  ऊर्जा सिद्धांत, परमाणु जैसी अवधारणाएँ पहले से ग्रंथों में थीं। इनका उल्लेख वेदों में किया गया है। कुछ अवधारणाएँ (जैसे खगोल ज्ञान) वास्तव में प्राचीन भारत में थीं, लेकिन उन्हें आधुनिक विज्ञान के बराबर मानना बहस का विषय है। आध्यात्म और तकनीक का संबंध के बारे में लेखक कहते है कि आध्यात्म सभी विज्ञानों की जड़ है। तकनीक को सही दिशा देने के लिए आध्यात्म आवश्यक बताया गया है। पुस्तक में आधुनिक समाज और सनातन ज्ञान को लेकर आज की पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश दिया गया है। 

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 पश्चिमी विज्ञान पर निर्भरता को कम करने की बात की गई है। लेखक ने कम उम्र में यह पुस्तक लिखकर सनातन विचारधारा को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है और भारतीय ज्ञान परंपरा को महत्व दिया है। यह पुस्तक भारतीय संस्कृति को नए नजरिये से देखने में मदद करेगी। यह पुस्त आज के युवा वर्ग, समाजिक नेतृत्वकर्ताओं के लिए काफी उपयोगी होगी। उन्हें यह समझने में कि 'सनातन धर्म केवल धार्मिक व्यवस्था नहीं, बल्कि ज्ञान और विज्ञान का आधार है, मददगार साबित होगी। यह पुस्तक समाज को एक नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाएंगी। मेरी अंनत शुभकामनाएं। 

 लेखक परिचय 

16 साल की उम्र में पहली पुस्तक 'सनातन धर्म : समस्त विज्ञान का वास्तविक स्त्रोत' लिखने वाले विवान करुलकर भारतीय विज्ञान और साहित्य के सहस्राब्दी के विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं।  भारतीय सेना ने विवान के योगदान को मान्यता दी और लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने उन्हें प्रशस्ति पत्र प्रदान किया। विवान करुलकर ने 14 वर्ष की आयु में ही नास्तिक से वैज्ञानिक बनकर सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने पृथ्वी के निकट की वस्तुओं (एनईओ) का पता लगाने की एक नई विधि के लिए सैद्धांतिक पेटेंट प्राप्त किया। इस उल्लेखनीय उपलब्धि ने उन्हें ऐसा करने वाला विश्व स्तर पर सबसे कम उम्र का व्यक्ति बना दिया। 16 वर्ष की आयु तक, विज्ञान और आध्यात्मिकता की दुनिया में उनकी यात्रा जारी रही और उन्होंने 'सनातन धर्म: विज्ञान का सच्चा स्रोत' नामक एक अभूतपूर्व पुस्तक लिखी। यह पुस्तक पश्चिमी वैज्ञानिक खोजों को चुनौती देती है, यह दावा करते हुए कि कई आधुनिक निष्कर्ष प्राचीन वैदिक ग्रंथों में पहले से ही प्रकट थे, और पश्चिम द्वारा कथित तौर पर 46 वैज्ञानिक अवधारणाओं की नकल की गई है।  उनकी पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण अयोध्या स्थित राम चंपत राय द्वारा विमोचित किया गया। विवान की उपलब्धियां लेखन तक ही सीमित नहीं हैं, उनके कार्यों ने उन्हें कई महत्वपूर्ण सम्मान दिलाए हैं, जिनमें बकिंघम पैलेस द्वारा दिया गया रॉयल कॉइन और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की प्रशंसा शामिल है, जिन्होंने उन्हें 10 डाउनिंग स्ट्रीट में आमंत्रित किया था। महज 17 वर्ष की आयु में विवान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद हॉल में अपनी पुस्तक का पुनः विमोचन किया, जिससे वे विज्ञान और आध्यात्मिकता दोनों क्षेत्रों में एक युवा दूरदर्शी के रूप में उभरे।  

अजय कुमार शुक्ल

हैदराबाद, तेलंगाना

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