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Jaunpur News: 90 बरस की उम्र में भी जिज्ञासा जिंदा है, अनुभवों का चलता-फिरता विश्वविद्यालय

अखबार के हर शब्द में खोजते जीवन का सार

चेतन सिंह

बरसठी, जौनपुर। घर के बरामदे में सादगी से बैठे एक बुजुर्ग, हाथों में खुला अखबार, बगल में पड़ी चारपाई और पास टिकाई एक छड़ी, यह दृश्य सिर्फ एक तस्वीर नहीं बल्कि समय, शिक्षा, संस्कार और सीख का जीवंत दस्तावेज है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में जहां लोग कुछ मिनट भी अखबार के लिए नहीं निकाल पाते वहीं करीब ढाई घंटे तक हर दिन अखबार की एक-एक खबर को ध्यान से पढ़ना यह बताता है कि जिज्ञासा कभी उम्र की मोहताज नहीं होती। क्षेत्र के खुआवा गांव निवासी 90 वर्षीय उदयभान सिंह एक अलग ही मिसाल पेश करते हैं। उनके हाथों में अखबार, आंखों में जिज्ञासा की चमक और चेहरे पर अनुभवों की गहराई मानो समय ठहर सा गया हो।

 भागदौड़ भरी दुनिया में जहां खबरें केवल ‘स्क्रॉल’ होकर गुजर जाती हैं वहीं हर शब्द को ठहरकर समझने की उनकी आदत आज भी जिंदा है। यह केवल पढ़ना नहीं बल्कि समाज, देश और समय को समझने की एक गंभीर प्रक्रिया है। ग्रामीण परिवेश से जुड़े होने के बावजूद देश-दुनिया की हर हलचल पर उनकी गहरी नजर हमेशा रहती है। बिना किसी जल्दबाजी के खबरों को समझना उनके अनुशासन और सजगता का परिचायक है। दिन में अखबार पढ़ना और शाम से रात तक टीवी पर समाचार व डिबेट देखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है, जो यह साबित करता है कि सीखने की कोई अंतिम सीमा नहीं होती। अनुभवों की गहराई और समझ की परिपक्वता के साथ जब जानकारी जुड़ती है तभी वह सच्चे अर्थों में ज्ञान बनती है। 

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उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए एक बड़ा संदेश यह देता है कि जानकारी पाना आसान है लेकिन समझ विकसित करना धैर्य और लगन मांगता है। घर के ऐसे बुजुर्ग किसी पुस्तकालय से कम नहीं होते। उनके पास बैठना, उनकी बातें सुनना और उनके अनुभवों को समझना यह वह शिक्षा है, जो किसी किताब में नहीं मिलती। जीवन के नब्बे वर्षों का अनुभव, संघर्षों से भरा सफर, खेती-बाड़ी की समझ, सामाजिक बदलावों की साक्षी और देश-प्रदेश ही नहीं, बल्कि विश्व घटनाओं पर सधी नजर यह सब मिलकर उन्हें एक जीवंत ‘विश्वविद्यालय’ बनाता है।

जब मैंने उन्हें इतने ध्यान से अखबार पढ़ते देखा, तो यह एहसास हुआ कि असली शिक्षा डिग्री में नहीं, बल्कि जिज्ञासा में होती है। इस उम्र में भी खबरों के प्रति उनका लगाव यह साबित करता है कि इंसान शरीर से बूढ़ा होता है, सोच से नहीं। यह दृश्य हमें यह भी सिखाता है कि आधुनिकता के इस दौर में अपनी जड़ों से जुड़े रहना कितना जरूरी है। सादगी, अनुशासन और सीखने की ललक ही पीढ़ियों को मजबूत बनाती है। ऐसे बुजुर्ग केवल परिवार की शान नहीं, बल्कि समाज की अमूल्य धरोहर होते हैं। उनकी उपस्थिति हमें बार-बार यह याद दिलाती है कि उम्र चाहे जितनी भी हो जाए, अगर मन में जिज्ञासा और सीखने की चाह बनी रहे, तो जीवन हमेशा गतिशील रहता है। सच में, यह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समय की किताब के वे पन्ने हैं, जिन्हें जितना पढ़ो, उतना ही नया सीखने को मिलता है और यही सीख हर पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी पूंजी है।

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