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Bareilly News: सप्त चक्र और सप्त पावन पुरियाँ: आनंद की ओर एक अंतर्यात्रा : गुरुदेव रविशंकर

 निर्भय सक्सेना @ नया सवेरा 

बरेली। गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार जैसे पतंग को आकाश में ऊँचा उड़ाने और धरती से साधने के लिए एक पतली डोर की आवश्यकता होती है। यह डोर भले ही भूमि पर रहती है, किंतु उसी के सहारे पतंग अनंत गगन में विचरती है। वह डोर ‘सूत्र’ कहलाती है। वैसे ही जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने और अनंत आकाश में विस्तार देने के लिए हमें भी एक ऐसे सूत्र की आवश्यकता होती है, जो पृथ्वी और आकाश, मानव और देवत्व के बीच सेतु का कार्य करे।15 फ़रवरी 2026 को आर्ट ऑफ़ लिविंग, बेंगलुरु आश्रम में स्वतंत्रता और आनंद की ओर ले जाने वाली इस अंतर्यात्रा में सम्मिलित होकर लाभान्वित हों।

गुरु रविशंकर के अनुसार सूत्र ज्ञान का सार है, यह अल्प शब्दों में गहनतम अर्थ का प्रकाश छिपाये हुए है । हम जिस सूत्र को थामते हैं, वही हमारे जीवन की दिशा और गुणवत्ता निर्धारित करता है। प्रत्येक जीवन में शुभता की कोई न कोई ज्योति अवश्य विद्यमान होती है। प्रश्न यह है कि हम उस शुभता को पकड़ते हैं या दुर्भाग्य और नकारात्मकता से चिपके रहते हैं।

हर जीवन में कुछ न कुछ मंगल घटित हुआ है, परंतु मन की प्रवृत्ति प्रायः सकारात्मक को उपेक्षित कर नकारात्मक को पकड़ लेने की होती है। इस वृत्ति को रूपांतरित करने के लिए हमें ‘शिव सूत्रों’ का आश्रय लेने का संकेत दिया गया है। ये सूत्र हमें सत्य, सौंदर्य और ‘शिव तत्त्व’, अर्थात्‌ शुभता और निर्दोषिता के सिद्धांत की ओर अग्रसर करते हैं। इसीलिए शिव सूत्रों का अध्ययन और मनन करने की प्रेरणा सदा से दी जाती रही है।

‘शिव सूत्र’ सनातन होते हुए भी निर्मल वायु के ताज़ा झोंके की तरह सदा नवीन हैं । वे मन को मुक्त करते हैं और आनंद का संचार करते हैं। वे मात्र दर्शन नहीं, अपितु चेतना का विज्ञान हैं।

पाँच-छः वर्ष के बालक या कुछ महीनों के शिशु को देखिए,उनके प्रत्येक कोश में उत्साह का प्रवाह स्पंदित होता है। अब वयस्कों को देखिए, आयु के साथ उनका उत्साह क्षीण होता जाता है। जब उत्साह ही मंद पड़ जाए, तो क्या हम वास्तव में जीवित हैं? यह ह्रास हमारे ही निर्मित ‘विश्व’ के कारण होता है—उस संसार के कारण, जिसे हमने अपने मन में रचा है।

क्या इसका समाधान समाज से पलायन कर हिमालय की गुफाओं में जा बैठना है? मात्र गुफा में प्रवेश कर लेने से आनंद नहीं मिलता, क्योंकि संसार बाहर नहीं, मन में विद्यमान है। उसे आपने ही रचा है और आप ही उसका विसर्जन कर सकते हैं। समाधान आपके ही भीतर निहित है।

शिव सूत्र का एक वाक्य स्पष्ट दिशा देता है—

“शक्ति-चक्र-संधाने विश्वसंहारः।”

अर्थात्‌ जब साधक अपने भीतर स्थित विभिन्न ऊर्जा-केंद्रों पर सजगता लाता है और उनका साक्षी बनता है, तब चिंताओं और चंचल विचारों का विश्व स्वयं विलीन हो जाता है। शांति स्वयमेव अवतरित होती है। यही बहिरंग को छोड़ अंतर्मुख होने की कला है।

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विभिन्न भावनाएँ शरीर के भिन्न-भिन्न केंद्रों को सक्रिय करती हैं। क्रोध उत्पन्न होता है तो भ्रूमध्य में स्पंदन अनुभव होता है। विषाद आता है तो कंठ अवरुद्ध हो उठता है। घृणा हृदय प्रदेश में हलचल करती है, जबकि ईर्ष्या उदर में मंथन उत्पन्न करती है। सद्भाव भी वहीं से अंकुरित होता है। प्रेम का अनुभव भी हृदय क्षेत्र में ही होता है।

यह सूक्ष्म जगत्‌ विराट जगत्‌ से जुड़ा हुआ है। शरीर में सात प्रमुख चक्रों के रूप में सात  ऊर्जा केंद्र स्थित हैं, जिन्हें सहस्रों सूक्ष्म नाड़ियों का जाल जोड़ता है। आश्चर्य की बात है कि ये सात चक्र भारत के सात पवित्र नगरों से भी संबद्ध माने गए हैं, माया या हरिद्वार, कांची, अयोध्या, मथुरा, काशी, अवंती (उज्जयिनी) और द्वारका।

चक्रों को भौतिक चक्र के रूप में कल्पित न करें। ध्यान के समय केवल सजगता को उन केंद्रों तक ले जाना ही पर्याप्त है। ऐसा करते ही नकारात्मक ऊर्जा क्षीण होने लगती है और सकारात्मक गुण जागृत होते हैं।

माया या हरिद्वार, मेरुदंड के आधार पर स्थित मूलाधार चक्र का प्रतीक है। जड़ता के हटते ही उत्साह जागृत होता है और यात्रा आरंभ होती है। हरिद्वार, अर्थात हरि के द्वार की ओर पहला कदम ।

कांची स्वाधिष्ठान चक्र से संबद्ध है, जहाँ कामाक्षी या कामना की अधिष्ठात्री शक्ति का वास माना जाता है। यह ऊर्जा कामवासना के रूप में भी व्यक्त हो सकती है और सृजनात्मकता के रूप में भी।

अयोध्या मणिपुर चक्र से जुड़ी है। यह नाभि प्रदेश का केंद्र है,  जहाँ आनंद, उदारता, लोभ और ईर्ष्या जन्म लेते हैं। कैकेयी की ईर्ष्या ने राम को वनवास दिया, किंतु राम की उदारता ने अयोध्या को गौरवान्वित किया। उनके पुनरागमन का उत्सव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। ‘अयोध्या’ का अर्थ है, जहाँ कोई युद्ध न हो।

मथुरा अनाहत चक्र, हृदय केंद्र का प्रतीक है। यहाँ प्रेम, भय और घृणा तीनों भाव उत्पन्न होते हैं। गोपियों की कृष्ण-भक्ति और कंस का भय, दोनों हृदय की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।

अवंती या उज्जयिनी विशुद्धि चक्र से संबद्ध है, यह  कंठ केंद्र का प्रतीक है, जहाँ भावनाएँ कृतज्ञता या करुण-वेदना के रूप में व्यक्त होती हैं। यह कला, साहित्य, यश और शोक की नगरी है।

काशी आज्ञा चक्र का प्रतीक है, जो ज्ञान का आसन, ‘ज्ञान-चक्षु’ अर्थात्‌ तृतीय नेत्र कहलाता है । यह केंद्र ज्ञान और क्रोध दोनों का उद्गम है। शिव का तृतीय नेत्र जब क्रोध में खुलता है, तो सब कुछ भस्म हो जाता है।

द्वारका शीर्ष के परम केंद्र, सहस्रार चक्र का प्रतिनिधित्व करती है। ‘द्वारका’ का अर्थ है—“द्वार कहाँ है?” जहाँ दीवार ही नहीं, वहाँ द्वार का प्रश्न भी नहीं उठता। सहस्रार मार्गहीन मार्ग है। यात्रा हरिद्वार से आरंभ होकर द्वारका पर पूर्ण होती है।

जब साधक प्राण ऊर्जा  के इन केंद्रों में प्रवाह का साक्षी बनता है, तब नकारात्मक भाव विलीन हो जाते हैं और वह बंधनों से मुक्त हो जाता है। महाशिवरात्रि इस अंतर्यात्रा के आरंभ के लिए विशेष रूप से शुभ काल है। यह काल शिव तत्त्व में विश्राम करने और शिव सूत्रों के ज्ञान में अवगाहन करने का भी है।

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