Jaunpur News: नाले ने निगल ली जिंदगी, बहादुरी ने लिख दी अमर गाथा
जौनपुर में बारिश ने खोला सिस्टम की लापरवाही का काला सच
रिक्शा चालक की कुर्बानी बनी इंसानियत की मिसाल
चेतन सिंह
जौनपुर | सोमवार की शाम जिले के मछलीशहर पड़ाव के पास एक दर्दनाक हादसे ने पूरे जनपद को झकझोर कर रख दिया। देर शाम हुई तेज बारिश के बीच सड़क किनारे खुले मैनहोल में अचानक एक युवती फिसलकर गिर पड़ी। बहाव इतना तेज था कि वह पलक झपकते ही नाले की गहराई में समा गई। लोगों की आंखों के सामने मौत का यह मंजर घटते ही आसपास अफरा-तफरी मच गई, लेकिन तभी वहां मौजूद कुल्हनामऊ निवासी ई रिक्शा चालक शिवा गौतम ने इंसानियत का परिचय देते हुए अपनी जान की परवाह किए बिना नाले में छलांग लगा दी। अफसोस, बहादुरी की यह जंग अधूरी रह गई—क्योंकि नाले से सटे एक विद्युत खम्बे की चपेट ने शिवा की जान ले ली। युवती का अब तक कोई पता नहीं चल पाया, लेकिन शिवा की कुर्बानी ने पूरे शहर को इंसानियत और बलिदान का सच्चा अर्थ समझा दिया।
इधर, हादसे के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया। जिलाधिकारी से लेकर पुलिस कप्तान तक रातभर रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे रहे। तमाम टीमें लगाई गईं, टॉर्च की रोशनी में नाले के अंधेरों को चीरा गया, लेकिन युवती लापता रही। अब ऐसे में सवाल यह है कि आखिर इस हादसे का जिम्मेदार कौन है? क्या बारिश ने शिवा गौतम को मारा? या यह मौत सीधे-सीधे सिस्टम की लापरवाही का नतीजा है?
फिलहाल, जौनपुर की हकीकत सबके सामने है। शहर से लेकर गांवों तक की सड़कें टूटी है, सड़कों के किनारे फैले ये खुले नाले कब किसे निगल लें, कहना मुश्किल है। हर साल करोड़ों रुपये सफाई और ढक्कन लगाने के नाम पर खर्च होते हैं, लेकिन बरसात होते ही सारे दावों और वादों की पोल खोल देती है। ऐसे में अब आम जनता पूछ रही है—अगर बजट बहता है तो ढक्कन क्यों नहीं लगते? अगर सफाई होती है तो नाले मौत का रास्ता क्यों बन जाते हैं? अफसरों और नेताओं के लिए यह सिर्फ एक ‘दुर्घटना’ हो सकती है, लेकिन पूरे जनपद के लिए यह जीवन का भयावह सत्य है। व्यवस्था का व्यंग्य यही है कि शहर में स्मार्ट सिटी और विकास के बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाए जाते हैं। मंच से भाषणों में उपलब्धियां गिनाई जाती हैं, मगर जमीनी हकीकत में जौनपुर की पहचान अब ऐतिहासिक और शिक्षा नगरी से ज्यादा मौत के नालों, गढ्ढा युक्त सड़कों का शहर बनती जा रही है। अफसरों, नेताओं, मंत्रियों की गाड़ियां निकलते समय सड़कें चमकती दिखती हैं, लेकिन आम आदमी की बुनियादी सुविधाओं, व्यवस्थाओं पर सुधार करने को लेकर किसी की नजर नहीं पड़ती है। फिर वही ढांढस, वही बयान, ‘जांच होगी’।
शिवा गौतम की शहादत सिर्फ उनके परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का नुकसान है। उन्होंने अपनी जान देकर इंसानियत को बचाने की कोशिश की हैं। उनके साहस को सलाम है, लेकिन उनका बलिदान यह भी कह रहा है कि अब बहुत हो चुका। जौनपुर को सवाल करना ही होगा—आखिर कब तक उनकी गलियां और नाले आम आदमी की लाशों से भरते रहेंगे? कब तक जनता को बरसात के मौसम में जिंदगी दांव पर लगानी पड़ेगी? और कब तक सरकारें और प्रशासन इस सबको किस्मत और दुर्घटना कहकर पल्ला झाड़ते रहेंगे? अंत में यही लिखूंगा कि रिक्शा चालक शिवा का जाना पूरे जौनपुर के लिए गहरा आघात है। उनकी बहादुरी अमर है, लेकिन यह हादसा हमारे सिस्टम की नाकामी का सजीव प्रमाण है।
अब वक्त है कि, जिम्मेदार जागें, वरना पूरे जिले की जनता यह मानने को मजबूर हो जाएगी कि यहां इंसानियत तो जिंदा है, लेकिन व्यवस्था पूरी तरह से मर चुकी है।
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