Poetry: खर पतवार | Naya Savera Network
नया सवेरा नेटवर्क
"खर पतवार "
हम सब खर पतवार है, तुम तुलसी की गंध।
पर विचार में दिख रही अहंकार दुर्गन्ध।।
कितने किये जुगाड़ तब, लता चढी आकाश।
पर उसमें दिखता नहीं, है सुगंध का वास।।
अपने में अलमस्त है, भींटों की झरबेर।
पड़ जायेगी दृष्टि भी, उस पर देर सबेर।।
तुम कश्मीरी सेब हो, हम सब खर पतवार।
पोषण अपने भाग का, तुम पर देते वार।।
मित्र किसी के अहम पर, करना भीषण वार।
कहो कहाँ से मिल गया, तुमको यह अधिकार।।
नहीं किसी को दे सके, हो सुगंध के फूल।
मत फेंको इस तरह से उन राहों में शूल।।
बेलि अभी जो उग रही, देते उसको प्यार।
कभी महक जाता अरे उसका भी संसार।।
खर पतवारों में उगा है आछी का फूल।
रातों को महका रहा, कभी न देता शूल।।
सबकी अपनी अहमियत, सबकी निज सामर्थ्य।
निन्दा करने का नहीं होता कोई अर्थ।।
तिरछे कांटे बेर के, हम कदली के पात।
किया अकारण ही सखे, छिन्न भिन्न मम गात।।
इनकी उन्नति के लिए, किया कभी कुछ कर्म?
क्या कुछ बनता है नहीं, इनके हित कुछ धर्म?
जन्माना ही नहीं है, मात पिता का कर्म।
पालन पोषण के लिए, बनता है कुछ धर्म।।
लूली लंगड़ी हो भले, पर अपनी संतान।
माता को अति प्रिय लगे, सहती क्या अपमान?
तुम गुलाब के फूल हो, हम सब खर पतवार।
मंहको तुम उद्यान में, अपना है करतार।।
खिला हुआ है डाल पर, इक गुलाब का फूल।
उसके चारों ओर हैं, चुभने वाले शूल।।
बेला कलि सबसे भली, रूप गंध रस भोर।
सबको आनंदित करे, चुभे न कोर कठोर।।
कवि जनार्दन प्रसाद अष्ठाना 'पथिक',
जौनपुर
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