14 नवम्बर बाल दिवस पर विशेष : आज बाल दिवस के अवसर पर देश के भावी कर्णधार बच्चों की वास्तविक स्थिति पर एक नजर | Naya Savera Network

नया सवेरा नेटवर्क

आज के दौर में दिखावे से भरी शिक्षा प्रणाली की घुड़दौड़ में देश के कर्णधार बच्चों के भावी जीवन के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में लगते घुन पर प्रकाश डालता यह सामयिक  ज्वलंत लेख 


छिनता बचपन - घुनता स्वास्थ्य

मम्मी समय हो चुका है स्कूल की गाड़ी आ ही रही होगी, मुंह में ब्रश डाले हुए अभिषेक ने अपनी मम्मी को बौखलाते हुए बोला। बेटा किचेन में पास्ता का पैकेट शायद होगा-! तुम्हारी टिफिन मैं तुरंत तैयार करती हूं।तब तक तुम जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो जाओ -- अपने पशुओं को चारा पानी डालकर पशुशाला से लौटते हुए अभिषेक की मम्मी ने कहा।
        मम्मी-मम्मी मुझे चाउमीन पसंद है और कल मैं स्कूल से लौटते समय खरीद कर अपनी बैग में रख ली थी--- अपनी बैग से पैकेट निकालते हुए गुड़िया बेटी ने बोला।
    क्या-क्या तैयार करूं मैं जल्दी- जल्दी में-- कुछ समझ में ही नहीं आ रहा--- अभी भैंस भी दुहने हैं, खाना बनाकर तुम्हारे पापा के लिए भी पहुंचाना है--- बेहद परेशान मुद्रा में मां किचेन से बोली। तब तक जोरदार लम्बा हारन बजाती हुई डग्गामार स्कूल वैन सामने से गुजरती है। गुड़िया कंघी लेकर जल्दी से मेरे पास आजा, गाड़ी वापस आ ही रही होगी--  मां  कच्चा - पक्का पास्ता कड़ाही से निकाल कर  टिफिन में भरते हुए बेटी को आवाज देती है।
      पूर्वसन्ध्या का ही रखे हुए दूध से तैयार चाय में टोस्ट डुबोकर खाती हुई बैठी बेटी का सिर पकड़कर मां जल्दी-जल्दी उसके बाल में कंघी करने लगती है। सिर के जल्दी-जल्दी हीलने-डुलने से चाय से भीगा हुआ मुंह तक पहुंचा टोस्ट का निवाला टूट कर जमीन पर गिर जाता है। नतीजतन गुड़िया ठीक से सुबह का चाय नाश्ता भी नहीं कर पाती है। तब तक उसका भाई बाहर से आवाज लगाता है--- गुड़िया   मेरी भी टिफिन लेकर जल्दी से आ-- स्कूल की गाड़ी आकर खड़ी है-- तब उसकी चोटी में रबड़ी डालते हुए, कांख में टिफिन दबाये हुए मां और बैग को बाहों में समेटे हुए एक हाथ में पानी का बोतल लिए गुड़िया घर से बाहर निकलती है।
      आप सब बच्चों को जल्दी नहीं तैयार करते हैं, हमें इन बच्चों को स्कूल पहुंचाकर फिर दूसरे रुट के बच्चों को लेने के लिए जाना होता है, छोटे बड़े कुल तीन चक्कर लगाना होता है रोज। देर होने लगती है, स्कूल का मालिक चिल्लाता है, एक तो गांव का रास्ता नहीं ठीक है --- झल्लाते हुए स्कूल वैन का खलासी बच्चों की मां की ओर रुख करते हुए बोला और बच्चों को स्कूल वैन में भूसे की तरह ठुसते हुए ड्राइवर को गाड़ी आगे बढ़ाने के लिए संकेत करता है‌। गाड़ी आगे बढ़ जाती है।
     बच्चों की मां राहत भरी लम्बी सांस लेती है, मानो की दिन भर के सबसे बड़े काम से उसे निजात मिल गई हो।
       वर्तमान समय में चल रहे उपरोक्त परिदृश्य पर वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक नज़रिए से दृष्टिपात करें तो हम स्पष्ट रूप से से अनुमान लगा सकते हैं कि देश के कर्णधार बच्चों का भावी जीवन शारीरिक एवं मानसिक रूप से किस कदर कुप्रभावित हो रहा है ? 
       यदि इन तथ्यों को आगे रख कर स्वास्थ्य विशेषज्ञ तथा बाल मनोवैज्ञानिकों को राष्ट्रीय मंच पर खुली बहस के लिए आमंत्रित किया जाय तो हमें चिंताजनक संभावनाओं का पता अवश्य चल जाएगा। जहां पास्ता, चाउमीन,मैगी नूडल्स जैसे तमाम फास्ट फूड बचपन से ही बच्चों की शरीर को दीमक की तरह खोखला बना रहे हैं वहीं दूसरी तरफ बवासीर, भगंदर, कब्ज-एसिडिटी, बदहजमी, फैटी लीवर, मोटापा, रक्तचाप, हृदय विकार जैसी लम्बी बीमारियों को अन्दर ही अन्दर गुपचुप जन्म देकर पोषित कर रहे हैं।‌इस तरह के व्यंजनों के नियमित सेवन से हमारे देश का भावी नागरिक पूरी तरह से रोगग्रस्त हो रहा है।
       ऐसे में सहसा अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे देश का भावी स्वास्थ्य कितनी गंभीर समस्याओं से घिरा हुआ है -! जबकी सरकारें शिक्षा स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में अधिक से अधिक धन व्यय करती हैं।
     ऐसे खान-पान बचपन से ही अपनी गहरी पैठ बनाकर बच्चों के शरीर को दीमक की तरह जहां खोखला बना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रोज की भागम-भाग बच्चों पर थोपी गई दैनिक दिनचर्या ऊपर से नाना प्रकार के विषय की पुस्तक कापियों  से ठसा-ठस भरे हुए बस्ते का बोझ उनमें मानसिक अवसाद पैदा कर रहा है। जो देश के बच्चों में चिड़चिड़ापन , क्रोध और मानसिक अवसाद भी पोषित कर रहे हैं।
     आज से करीब एक दशक पहले पास्ता, चाउमीन, मैगी नूडल्स आदि जैसे हानिकारक फास्ट फूड जहां बड़े-बड़े शहरों महानगरों में जहां-तहां देखने सुनने को मिल जाते थे, वहीं आज ये गांव गली मुहल्ले की हर छोटी बड़ी दुकानों में पैकेट बंद छल्लों में झूलते हुए बड़े पैमाने पर देखने को मिल जाते हैं। कितने दुकानदार तो बताते हैं कि सुबह- सुबह इन सामग्रियों से अधिक बिक्री किसी भी चीज की नहीं होती है।
  गनीमत होगी कि हमारे देश का स्वास्थ्य मंत्रालय ऐसे खान-पान के उत्पादन और बिक्री पर गंभीरता पूर्वक विचार करे। वरना हमारी भावी पीढ़ियां गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं के दलदल में फंस जाएगी। दैनिक दैनिक दिनचर्या एवम् अत्याधुनिक खान-पान के चलन से दिन प्रतिदिन उच्च रक्तचाप, ब्रेन हेमरेज, हार्ट अटैक, जैसी गम्भीर बीमारियों साहित मोटापा, डायबिटीज,गैस-एसिडिटी, बदहजमी, फैटी लीवर, कब्ज़ बवासीर, भगंदर जैसी लम्बी  बीमारियों का ग्राफ उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा है। जो राष्ट्रीय स्तर पर एक चिंता का विषय है। किन्तु इस पर किसी का ध्यानाकर्षित नहीं हो रहा है।
   यदि विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों की बात करें तो हम पाएंगे कि तकरीबन पचास प्रतिशत से ऊपर विद्यालय के भी बच्चे ऐसे ही मीठे जहर के खान-पान के शिकार हो रहे हैं या फिर दोपहर तक खाली पेट रहने को मजबूर हो रहे हैं। आज के दौर में नगरीय महानगरीय विद्यालयों के खुलने बंद होने की समय सारिणी और सुदूर ग्रामीण अंचलों के सरकारी गैर सरकारी विद्यालयों की समय सारिणी एक समान लागू है। जबकि दोनों जगह की स्थितियों परिस्थितियों में कोई समानता नहीं है। नगरों महानगरों में बसे परिवार प्रायः एकल और छोटे होने के साथ-साथ साधन संसाधन से युक्त एवं पशुपालन खेती -बाड़ी से मुक्त होते हैं,वहीं ग्रामीण अंचल में बसने वाले परिवार प्रायः संयुक्त और खेती-बाड़ी पशुपालन युक्त होते हैं। ऐसी स्थितियों में गैर जागरूक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले बच्चों के माता पिता विद्यालयों के दैनिक सुबह खुलने के कभी सुबह 7 बजे तो कभी 8 बजे तक भोजन या उपयुक्त नाश्ता भला कैसे दे सकते हैं ? परिणाम स्वरूप नन्हें-नन्हें बच्चे स्कूल में दोपहर मध्यान्ह भोजन मिलने  तक खाली पेट रहने को मजबूर रहते हैं। जहां इन छोटे-छोटे नन्हें-मुन्ने बच्चों के वृद्धि विकास हेतु सुबह बड़ों से पहले भोजन की आवश्यकता होती है, वहीं इन बच्चों को परिवार के बड़े लोगों के बाद ही भोजन से भेंटे हो पाती है। यह कैसी विडम्बना है-? बच्चे खाली पेट ही अपनी कक्षा में मध्यान्ह भोजन तक पढ़ने-लिखने को मजबूर होते हैं । ऐसी स्थिति में इनके  चतुर्दिक विकास की कल्पना भला हम कैसे कर सकते हैं ?
     अनुभव और जानकारी के मुताबिक ऐसा भी पाया जाता रहा है कि कुछ जागरूक परिवार के लोग बच्चों के स्कूल आने के बाद विद्यालय में अपने बच्चों की टिफिन पहुंचाने आते हैं। वहीं कुछ अभिभावकों को तो इसका कोई गम ही नहीं रहता। वे ये कह कर मुक्त हो जाते हैं कि स्कूल में 'एम डी एम' तो मिलेगा ही। बच्चे भूख से अंदर ही अंदर तड़प रहे होते हैं। उनका ध्यान कक्षा में सिखाई जा रही विषय वस्तु से भटकता हुआ रेशस के घण्टे की तरफ़ आश लगाए रहता है। रेशस की घंटी बजते ही ऐसा प्रतीत होता है कि मानो वे सब एक साथ ही कक्षा से बाहर निकल जाने पर आमादा हैं, और होगें भी क्यों नहीं,अनेक पेट में चूहे जो कूद रहे होते हैं। बहुत ही चिंताजनक स्थिति है ये।
      हमें उपारोक्त स्थितियों पर विचार करना होगा,साशन का भी ध्यानाकर्षण कराना चाहूंगा इस ओर कि नगरों महानगरों में चल रहे विद्यालयों की दैनिक खुलने बंद होने की समय सारिणी और सुदूर ग्रामीण अंचलों के विद्यालयों की समय सारिणी क्या एक ही होनी चाहिए--किस प्रकार से यह व्यवहारिक है? क्या गांवो में चल रहे विद्यालयों की दैनिक खुलने बंद होने का समय अलग नहीं होनी चाहिए -? गर्मियों में चल रहे विद्यालयों की दैनिक समय सारिणी का कितना व्यवहारिक लाभ है ? शायद इससे तो गर्मी से कोई निजात नहीं मिलती। बल्कि एक बजे दोपहर में स्कूल की छुट्टी होने पर ही भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है बच्चों को।
  हमारे विचार से तो यही लगता है कि अप्रैल,मई और जून माह(दूसरा पखवारा) को छोड़कर पूरे सत्र ग्रामीण अंचलों के प्राथमिक,जूनियर विद्यालयों का समय दस बजे से शाम चार बजे तक निर्धारित होना चाहिए जिससे हर स्तर के परिवार अपने नन्हें-मुन्ने बच्चों को सुबह का भोजन तो कराकर भेज सकें स्कूल।

लेखक-
      विजय मेहंदी(कवि-हृदय शिक्षक)
                जौनपुर (उoप्रo)

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