श्रीरामचरितमानस | #NayaSaveraNetwork
भारतीय मानस पर अमिट छाप छोड़ने वाली रचनाओं को पंक्तिबद्ध किया जाए तो गोस्वामी तुलसीदास जी की यह अमर कृति शीर्ष स्थान पर विराजमान होगी. हिंदी साहित्य का महाकाव्य एक वैश्विक धरोहर है. काव्यगत विशेषताओं की बात करें तो यह कालजयी रचना अप्रतिम है. काव्य के विषय की बात करें तो यह कृति संपूर्ण नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, व्यवहारिक विज्ञान व राजनीतिशास्त्र का सार संग्रह है. इस कृति ने कवि तुलसीदास को संसार के सर्वकालिक श्रेष्ठ रचनाकारों में स्थायी तौर पर स्थापित करा दिया है.
सोलहवीं सदी- भारतीय इतिहास के मुग़लकाल व हिंदी साहित्य के स्वर्णकाल- में गोस्वामी जी अवधी भाषा में वाल्मीकि के राजा राम को भगवान श्रीराम के रूप में गढ़ रहे थे, जो आगामी अनंत वर्षों तक मानव जाति का मार्गदर्शन करने वाले हैं.
गोस्वामी जी ने भारतीय विश्वास के पात्र राम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र के रूप में अपने काव्य कौशल के बूते स्थापित कर दिया.
सन 1574 ईस्वी के राम नवमी के दिन से आरंभ कर- लगभग दो वर्ष,सात माह और छब्बीस दिन में- सन 1576 के राम विवाह के दिन इस कृति को गोस्वामी जी ने पूर्ण किया.
गोस्वामी जी ने महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत रामायण को आधार बनाया किंतु तत्कालीन समयानुसार लोकभाषा अवधी को चुना.
समाज में व्याप्त अराजकता और भय के माहौल को देखते हुए कविश्रेष्ठ ने ऐसे चरित्र को गढ़ा जो जनसाधारण को नैतिक संबल दे.
श्रीरामचरितमानस को गोस्वामी जी ने सात काण्डो में विभक्त किया है- बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किंधाकाण्ड, सुंदरकाण्ड, लंकाकाण्ड व उत्तरकाण्ड.
छंदों की संख्या के अनुसार बालकाण्ड सबसे बड़ा और किष्किंधाकाण्ड सबसे छोटा है. गोस्वामी जी ने अलंकारों का सर्वोत्तम प्रयोग किया है- विशेषतया अनुप्रास अलंकार की आभा अद्भुत है.
श्रीरामचरितमानस प्रत्येक भारतीय,विशेषकर हिंदू, की आत्मा का श्रृंगार है. इसे हिंदूओं का पवित्र ग्रंथ माना जाता है..
कुलजमा, श्रीरामचरितमानस सभी के लिए आदरणीय/पठनीय/अनुकरणीय है.
