#VaranasiNews: राम जियावन दास 'बावला' मूलतः किसान कवि हैं : डॉ. बलभद्र | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
वाराणसी। भोजपुरी अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के राहुल सभागार में शोध संवाद समूह के द्वारा "रामजियावन दास 'बावला' सृजन और सरोकार" विषय पर वैचारिक संगोष्ठी आयोजित की गई। इस कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथियों एवं वक्ताओं का स्वागताभिनंदन भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो० प्रभाकर सिंह सर ने किया। प्रो० सिंह आगे कहते हैं कि अब हमलोगों को मेगा नैरेटिव की जगह स्मॉल नैरेटिव पर बात करनी चाहिए। बावला जी ग्रामीण चेतना के सशक्त हस्ताक्षर हैं। किसान जीवन की विविध रूप उनके यहाँ देखा जा सकता है। राम काव्य पर उन्होंने आजीवन कार्य करते रहे। उन्होंने राम काव्य पर मार्मिक गीत लिखे हैं इसलिए रामजियावल दास बावला जी को भोजपुरी का तुलसी कहा जाता है।
मुख्य अथिति के रूप में बलभद्र जी ने कहा कि बावला जी मूलतः किसान कवि हैं। बावला जी लोकभाषा के के कवि हउवन, उ शिव पर , राम पर अउरी खेती किसानी पर खुब कविता लिखने हउवन। भारतीय संस्कृति में कउनो काज अपने अराध्य के नाम के करल जाला। इहै कारण बावला जी भी राम अउरी शिव के याद हर दिनचर्या के काज में करले हउवन। लेकिन उनकर जीवन के पूरा संग्राम किसान जीवन के आसपास ही है। कविता जितना कहता है उससे अधिक सुनना पड़ता है तब जाकर उसे अपने समय से जोड़ कर देख सकते हैं।
जनार्दन जी ने रामजियावन दास 'बावला' के प्रारंभिक जीवन एवं जीवन संघर्ष के बारे विस्तार से बताएं। उन्होंने आगे कहा कि बावला जी एक जनकवि थे। उन्होंने कवि बनकर कभी कविता नहीं लिखी, सामान्य गांव गवई के जीवन जीते जो कुछ अनुभव हुआ उसे लिखे हैं। बावला जी के साहित्यिक योगदान को देखकर भोजपुरिया अमन पत्रिका अपना अगला विशेषांक रामजियावन दास बावला पर निकालेगी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो सदानंद साही ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहते हैं कि रामचरितमानस का जितना प्रभाव अवधि समाज पर है उससे कम प्रभाव भोजपुरी समाज पर भी नहीं है। भोजपुरी साहित्यिक समाज में रामचरितमानस एवं पद्मावत लिखने की अभी अपार संभावनाएं हैं। कवि का एक प्रमुख दायित्व यह है कि जो वंचित है, शोषित उनको प्रथमत: स्थान दे और इस तरह के कार्यक्रम का उद्देश्य भी यही है। बावला जी आपादमस्तक कवि हैं। कविता उनके जीवन से रिसती है उन्हें कविता लिखने की जरूरत नहीं पड़ती।
इस कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ अमित कुमार पाण्डेय जी ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन केन्द्र के वरिष्ठ शोधार्थी आर्यपुत्र दीपक ने किया।
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