#Poetry : बबुआ बूढ़ होइ गइल भरी जवानी मा | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
बबुआ बूढ़ होइ गइल भरी जवानी मा
खेत अउ किसानी मा न
गांव में रहने वाले एक नवयुवक के दिल का दर्द सुनिए जिसकी शादी एक पढ़ी लिखी लड़की से हो गई है।शहर में रहने वाले एक मित्र ने हाल चाल पूछा तो उसने कहा-
बबुआ बूढ़ होइ गइल भरी जवानी मा
खेत अउ किसानी मा न।
इक त चॅंपल महंगाई,
दुसरे नकचढ़ी लुगाई,
तिसरे भउजी आगि-
लगावेला पानी मा,
खेत अउ किसानी मा न।
सेल्फी-टैटू के बाद जोर,
सबके जियरा मा हिलोर,
जिनगी झंड होइ -
गइल बा खींचातानी मा,
खेत अउ किसानी मा न।
माई न रहे क घाटा,
लउके ठोंकवा अउ न लाटा,
रोज खात बानी,
मैगी घोरि पानी मा ,
खेत अउ किसानी मा न।
गोरी कइ सत्रह श्रृंगार,
घूमइं निसरइं जउ बजार,
आगि लागइ जइसे-
हमरी जिंदगानी मा ,
खेत अउ किसानी मा न।
जइसे सूखा लागे ताल,
जइसे मुर्गा हो हलाल,
जइसे दालि उबले-
अदहन वाले पानी मा ,
खेत अउ किसानी मा न।
देखि-देखि छउंछियाई,
जियरा ढुनमुनी न खाई?
तनि बताई, ट्विस्ट-
आई न कहानी मा?
खेत अउ किसानी मा न।
रहल हमरा जेतना ख्वाब,
सरि के बनि गइल शराब,
अब सुरेश जियत -
हउवें मेहरबानी मा,
खेत अउ किसानी मा न।
बबुआ बूढ़ होइ गइल भरी जवानी मा
खेत अउ किसानी मा न।
सुरेश मिश्र