#Poetry: हरे रामा मुड़वा पे चढ़ल महंगाई | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
हरे रामा मुड़वा पे चढ़ल महंगाई,
समुझि नहीं पाई रे हरी ।
बावन रुपिया आलू होइ गइ,
अस्सी भइल टमाटर रामा,
हरे रामा कइसे केउ घरवा चलाई
समुझि नहीं पाई रे हरी ।
बिना कटे ही प्याज रोवावइ,
परवर आंखि तरेरइ रामा,
हरे रामा तरकारी कइसे केउ खाई
समुझि नहीं पाई रे हरी ।
दालि क हालि पिया मत पूछा,
दोहरा शतक लगउलेसि रामा,
हरे रामा बनिया बनल बा कसाई
समुझि नहीं पाई रे हरी ।
तेल क खेल प्रभू ही जानइं,
घी बनि गइल सपनवां रामा
हरे रामा तड़का केउ कइसे लगाई
समुझि नहीं पाई रे हरी ।
कोहड़ा मोहड़ा लइ नहिं पावइ,
कटहर बनल मटनवां रामा,
हरे रामा काहें न केउ खिसियाई
समुझि नहीं पाई रे हरी ।
हरियर धनियां मुंह बिचकावइ,
मूड़ चढ़ी सरपुतिया रामा,
हरे रामा, बरखा किहेसि बेवफाई
समुझि नहीं पाई रे हरी ।
प्रिय सुरेश अब हमइ बतावा,
महंगा भइल मसलवा रामा,
हरे रामा, कइसे बने अब खटाई,
समुझि नहीं पाई रे हरी ।
सुरेश मिश्र


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