जंतर-मंतर के छात्रों की एफ़आईआर पर सुप्रीम कोर्ट क़ी 1 सितंबर 2026 को निर्णायक सुनवाई?
एफ़आईआर का डर या भविष्य की नई सुबह? - निर्दोष छात्रों और गंभीर आरोपियों के बीच खिंचेगी कानूनी लकीर
नया सवेरा नेटवर्क
साथियों,सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़े सभी छात्रों के केस खत्म हो जाएंगे?इसका उत्तर फिलहाल सीधा हां कहना कानूनी रूप से सही नहीं होगा। केंद्र ने एफ़आईआर रद्द करने की मांग की है,लेकिन अंतिम आदेश और उसकी शर्तें सुप्रीम कोर्ट तय करेगा।उपलब्ध जानकारी से यह संकेत मिलता हैकि अदालत शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल वास्तविक छात्रों को राहत देने और गंभीर आपराधिक मामलों वाले व्यक्तियों को अलग रखने की व्यवस्था पर विचार कर सकती है। इसलिए आंदोलन में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति को केवलछात्र होने के आधार पर स्वतःपूर्ण छूट मिलना जरूरी नहीं है। अदालत के सामने वास्तविक चुनौती यही होगी कि शांतिपूर्ण असहमति और आपराधिक हिंसा के बीच स्पष्ट कानूनी सीमा कैसे निर्धारित की जाए।
साथियों इस संदर्भ में संविधान का अनुच्छेद 142 अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट कोकिसी लंबित मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक आदेश देने की असाधारण शक्ति प्रदान करता है। केंद्र का तर्क यही है कि यदि सामान्य आपराधिक प्रक्रिया केतहत प्रत्येक एफ़आईआर को अलग-अलग पुलिस और मजिस्ट्रेट स्तर की प्रक्रिया से गुजारना पड़ेगा,तो छात्रों को वर्षों तक मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है और उनके शिक्षा तथा रोजगार संबंधी भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।इसलिए एक व्यापक न्यायिक समाधान के माध्यम से वास्तविक छात्रों को राहत देने का रास्ता खोजा जा रहा है। लेकिन इस शक्ति का प्रयोग किस सीमा तक होगा और किन व्यक्तियों पर लागू होगा, इसका अंतिम निर्धारण सुप्रीम कोर्ट करेगा।
साथियों,यहीं से 2,873 लोगों का आंकड़ा भी चर्चा के केंद्र में आता है।दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया है कि फेस रिकग्निशन सिस्टम के माध्यम से प्रदर्शन से जुड़े 2,873 ऐसे व्यक्तियों की पहचान हुई जिनके नाम पुलिस के मौजूदा आपराधिक रिकॉर्ड से मेल खाते थे। पुलिस के अनुसार इनमें 2,402 लोग क्राइम कुंडली डाटाबेस और 471 लोग डोस्सियर रिकार्ड्स के माध्यम से पहचाने गए। इनमें से 92 लोगों के खिलाफ दस से अधिक मामले होने की बात कही गई और 47 को हिस्ट्री-शीटर्स बताया गया।हालांकि यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना आवश्यक है,किसी व्यक्ति के खिलाफ एफ़आईआर या पुराना आपराधिक मामला दर्ज होना अपने-आप उसकी दोषसिद्धि साबित नहीं करता। इसलिए केवल पुराने रिकॉर्ड के आधार पर किसी व्यक्ति को आंदोलन के दौरान किए गए अपराध का दोषी मानना भी उचित नहीं होगा। वास्तविक भूमिका, आरोप और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच आवश्यक होगी।
साथियों,इसी कारण 1 सितंबर की सुनवाई में स्क्रीनिंग या पहचान की प्रक्रिया सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक हो सकती है। यदि अदालत छात्रों को व्यापक राहत देती है तो यह तय करना आवश्यक होगा कि कौन वास्तविक छात्र था, किसने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया,किसकेखिलाफ केवल प्रदर्शन में मौजूद रहने के कारण मामला दर्ज हुआ और किस व्यक्ति पर आंदोलन के दौरान हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या पुलिसकर्मियों पर हमला जैसे विशिष्ट आरोप हैं।दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप हैं तो केवल इस आधार पर कि वह प्रदर्शन में शामिल था, उसे स्वतः राहत देना न्याय के उद्देश्य के विपरीत हो सकता है। इसलिए संभावित न्यायिक मॉडल सभी को माफी के बजाय निर्दोष और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को राहत, वास्तविक अपराध के आरोपियों की कानूनी प्रक्रिया जारी’ पर आधारित हो सकता है।
साथियों,इस मामले का दूसरा बड़ा स्तंभ सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी है।18 अगस्त को गठित इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस शालिंदर कौर, पूर्व सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपीएल शामिल हैं। अदालत ने समिति को स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए गठित किया है तथा उसे सुप्रीम कोर्ट की प्रत्यक्ष निगरानी में काम करना है।
समिति का महत्व केवल पुलिस कार्रवाई की जांच तक सीमित नहीं है। उसे कथित अत्यधिक और अनुपातहीन बल प्रयोग, प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार, महिलाओं के खिलाफ कथित यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार, निगरानी और अन्य संबंधित शिकायतों की जांच करनी है।अदालत ने महिलाओं से जुड़ी शिकायतों को प्राथमिकता से देखने को भी कहा है। इसके अतिरिक्त पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए बल की वैधता और अनुपातिकता तथा भविष्य में बड़े जनसमूह के प्रदर्शन से निपटने के लिए पुलिस व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दे भी व्यापक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं।
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साथियों, दरअसल,यह मामला भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक व्यापक संदेश भी रखता है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार नागरिक स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन यह अधिकार हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति के विनाश या दूसरे नागरिकों और पुलिसकर्मियों पर हमले का लाइसेंस नहीं बन सकता। सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती यही है कि वह ऐसी व्यवस्था तैयार करे जिसमें शांतिपूर्ण असहमति को अपराध न बनाया जाए और वास्तविक अपराध को विरोध के अधिकार की आड़ में संरक्षण भी न मिले। दिल्ली पुलिस ने भी अदालत के समक्ष कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन जब प्रदर्शन हिंसा और संपत्ति के नुकसान में बदल जाए तो कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी भी राज्य की है।
अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 1 सितंबर 2026 की सुनवाई केवल एफ़आईआर रद्द करने का मामला नहीं होगी,बल्कि यह भारत में छात्र आंदोलन, नागरिक अधिकार, पुलिस शक्ति, डिजिटल निगरानी और न्यायिक हस्तक्षेप के बीच संतुलन की परीक्षा भी होगी। यदि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत वास्तविक छात्रों को सामूहिक राहत देने का रास्ता निकालता है, तो हजारों युवाओं के लिए यह उनके शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य को बचाने वाला महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। लेकिन अदालत के लिए उतना ही जरूरी होगा कि गंभीर आरोपों और केवल पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के बीच अंतर किया जाए तथा किसी व्यक्ति को बिना उचित जांच के दोषी न माना जाए। इसलिए 1 सितंबर का सबसे संभावित और न्यायसंगत दृष्टिकोण यही दिखाई देता है कि निर्दोष छात्रों को शीघ्र राहत मिले, लेकिन वास्तविक आपराधिक कृत्यों की स्वतंत्र जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहे। जंतर-मंतर का यह विवाद आने वाले समय में भारत केलोकतांत्रिक विरोध और पुलिसिंग के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मिसाल भी बन सकता है।
-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
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