Poetry: मुझे पहचानो, मै कौन हूं...
नया सवेरा नेटवर्क
मुझे पहचानो, मै कौन हूं...
कवयित्री चांदनी मिश्रा
हर सिक्के के दो पहलू
पहली सफलता की सीढ़ी
दूसरी असफलता पर आकर रुकी........
सच है नौकरी करना आसान नहीं,
उसपर नौकरी के साथ परिवार चलाना उतना ही मुश्किल,,,
जितना आसान बिस्तर पर बैठ कर भोजन करना......
पर उस नौकरी का क्या,,,,,,,,,,,,
जहाँ न नाम मिले, न तनख्वा, न pf si, न बोनस, और तो और पदोन्नति या शाबासी भी नहीं मिलती......
उस नौकरी का क्या जहाँ
ना आने का समय है,
ना जाने का समय है........
ना जीवन मे कुछ पाने की उम्मीद,,
ना ही घंटो का मुयाना हुआ है...
ज़ब मालिक दो बात सुनाता है तो,,,
चुप्पी उसकी डर की नहीं,,
महीने मे मिलने वाली आखिरी तारीख पर उस की क़ीमत होती है
जिससे मेरा परिवार चलता है.....
पर उस नौकरी का क्या जहाँ न कोई हफ्ता, न कोई महीना,न कोई साल.......
चमक तो चेहरे पर तब आती है ज़ब महीने की वो तारीख आती है
ज़ब किए हुए मेहनत का फल मिलता, जिस फल की लालच मे
जितना मर्जी उतनी मेहनत करा लेते है.....
उस मेहनत का क्या जहाँ बस मुस्कान चाहिए.......
तुम कहते हो नौकरी करो तो पता चले.......
इस नौकरी से फुर्सत मिलती तो वैसे सैकड़ो नौकरी करते
. जहाँ किए का फल मिलता.......
बिना फल की कामना के की गयी नौकरी..........
मुझे पहचानो
मै कौन हूं।
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