Poetry: हे राम! मैं तुझसे क्या मांगू
नया सवेरा नेटवर्क
हे राम! मैं तुझसे क्या मांगू
हे राम! हे राम! हे राम!
मैं तुझसे क्या मांगू
तू सर्वगुण, सर्वव्यापी है,
तू ही मथुरा और काशी है।
इस जगजीवन का तू प्राणधार;
मुझमें तेरा ही है प्रलाप
इस जीव को संचय क्या करना,
सब छोड़ दिया तुझ पर अपना
मन में उठे जो ह्रास है तू
जो आए दुर्बल विकार भी तू
तू निर्माता इस सृष्टि का
तू जगदाता इस पृथ्वी का।
जब धरा पर पर हमने जन्म लिया
मुझमें तेरा अवशेष रहा
तू अटल अनंत अविनाशी है
तुझमें विलीन मेरी थाती है,
अब शेष बचा क्या इस जग में
अब शेष बचा क्या इस जग में
तुझमें मैं हूं तू है मुझमें
अब क्या ही हाथ पसारू मैं
किस भांति तुझे पुकारूं मैं,
करती हूं तेरा ही वंदन
तू ही है मेरा वन उपवन
अब संशय नहीं मेरे मन में
राम ही है मेरे तन में
यदि राम नहीं जो चाहेंगे
कीचड़ में कमल न आयेंगे
संसार से जब हम जाएंगे
तुझमें विलीन हो जाएंगे।
तू कण कण में है व्याप्त राम
तू हर क्षण में है व्याप्त राम
हे राम राम! हे राम राम ।।
कवयित्री पूर्णिमा उपाध्याय
मऊ, उत्तर प्रदेश
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