दिल्ली की तीन सगी बहनों की आत्महत्या:समाज और शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी
✍️ डॉ. ममता सिंह
सहायक प्राध्यापक, मनोविज्ञान विभाग
मोहम्मद हसन पी.जी. कॉलेज, जौनपुर
नया सवेरा नेटवर्क
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, तीनों बहनें पढ़ाई और भविष्य को लेकर अत्यधिक मानसिक दबाव में थीं। प्रतियोगी माहौल, सफलता की अनिवार्यता और असफलता के भय ने उन्हें इस कदर घेर लिया कि जीवन से बड़ा उन्हें कोई विकल्प दिखाई नहीं दिया। यह घटना उस सोच को उजागर करती है, जिसमें बच्चों की योग्यता को केवल अंकों, रैंक और करियर से आँका जाता है।
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आज का छात्र केवल पाठ्यक्रम का बोझ नहीं ढो रहा, बल्कि परिवार और समाज की अपेक्षाओं का भार भी अपने कंधों पर उठाए हुए है। “हर हाल में सफल होना है” और “दूसरों से बेहतर साबित करना है” जैसी मानसिकता बच्चों को अंदर ही अंदर तोड़ देती है। दुर्भाग्यवश, कई बार वे अपनी पीड़ा और भावनाएँ किसी से साझा करने का साहस भी नहीं जुटा पाते।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो लगातार दबाव, भावनात्मक समर्थन की कमी और असफलता को स्वीकार न कर पाने की प्रवृत्ति आत्मघाती विचारों को जन्म देती है। बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जीवन में असफलता अंत नहीं, बल्कि सीखने और आगे बढ़ने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
यह घटना अभिभावकों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं सभी के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। बच्चों से संवाद, उनकी रुचियों का सम्मान, विकल्पों की स्वतंत्रता और समय पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। केवल करियर ही नहीं, बल्कि बच्चों का मानसिक संतुलन और खुशी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
समाज को यह समझना होगा कि हर बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर या टॉपर बनने के लिए नहीं, बल्कि एक संपूर्ण, संवेदनशील और खुशहाल इंसान बनने के लिए पैदा होता है। यदि समय रहते हम नहीं जागे, तो ऐसी त्रासद घटनाएँ बार-बार हमें झकझोरती रहेंगी।
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