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Jaunpur News: शहीद पिता की गुहार 'बेटे के शहादत का कब मिलेगा उचित सम्मान'

पुलवामा शहादत दिवस पर छलका शहीद परिवार का दर्द

आखिर शहादत के सम्मान को शासन/प्रशासन व जनप्रतिनिधियों की नजर में क्यो नही आता ?

शहीद के पिता दस सालों से काटा चक्कर,अब हो गए है अस्वस्थ

विनोद कुमार @ नया सवेरा 

केराकत,जौनपुर। पुलवामा आतंकी हमले की बरसी पर बलिदान हुए शूरवीरों को देश ने नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।वही केराकत तहसील अंतर्गत भौरा ग्राम में शहादत दिवस को याद करते हुए शहीद संजय सिंह का परिवार नम आंखों से शहीद बेटे को श्रद्धांजलि दी।शहीद के पिता श्यामारायण सिंह 84 वर्ष शहीद बेटे का फोटो हाथ में लेकर उसे चूमते और साफ करते देखा गया साथ ही लगभग 6 वर्षों से खुद के खर्च पर जोधपुर से लाई गई प्रतिमा से लिपटकर चीखकर रोने लगे।यह मंजर देख पास खड़े हर शख्स की आंखें भर आई।मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्होंने शहीद का पिता होने पर गर्व है मगर अफसोस होता है कि शहादत के समय शहादत की राजनीतिकरण करने के लिए हर पार्टी के लोग पहुँचते हैं। बड़े बड़े वादे भी करते है और चले जाते है।कुछ वादे पूरे होते है तो कुछ वादे वादे कोरी व झूठी साबित होती है।पिछले दस सालों से शहीद बेटे के शहादत के उचित सम्मान के तहसील से लेकर जिले का चक्कर काटा लेकिन उसका कोई असर नहीं दिखा।थकहार कर निजी खर्च पर जोधपुर से शहीद बेटे के सम्मान व उनकी याद में दो लाख की मूर्ति बनवाकर लाई गई मगर शासन की उपेक्षा के चलते मूर्ति की स्थापना नहीं हो सकी और पिछले 6 सालों से लकड़ी के बॉक्स में वैसे ही पड़ी हुई है।

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बता दे कि जम्मू कश्मीर के पम्पोर जिले में पाकिस्तान द्वारा कायराना आतंकी हमला हुआ जिसमें संजय सिंह आतंकवादियों का मुंह तोड़ ज़बाब देते हुए शहीद हो गए शहादत की खबर जब उनके पैतृक घर भौरा में हुई तो परिवार के साथ पूरे क्षेत्र में मातम का माहौल छा गया जब तिरंगे में लिपटे शहीद बेटे का शव भौरा गॉव में आया तो शहीद बेटे को एक झलक पाने के लिए जनशैलाब उमड़ गया। लोगो ने नम आंखों से शहीद को विदाई दिए और पाकिस्तान के मुर्दाबाद के नारों से पूरा केराकत गूंज उठा।और अब शहीद बेटे के शहादत के उचित सम्मान के लिए पिता की आखिरी उम्मीद भी लगभग खत्म हो चुकी क्योंकि शहीद के पिता अस्वस्थ अवस्था में बिस्तर पर पड़े हुए है।

 सरकार जहां शहीद हुए जवानों को लेकर बड़े बड़े वादे करती हैं। वही शहीद संजय सिंह के शहादत के सम्मान को शासन प्रशासन व जनप्रतिनिधियों की नजर में क्यो नही आता हैं ? आखिर जनप्रतिनिधि ऐसे वादे ही क्यों करते है जिसे पूरा ही नही किया जा सकता हो ? क्या 15 अगस्त,26 जनवरी,कारगिल विजय दिवस व पुलवामा दिवस पर केवल शहीदों को याद करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हैं?

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