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मत काटो किसी की पतंग

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आज छत पर खड़ी थी,

आसमान के छोर की ओर देख रही थी।

चारों तरफ रंग-बिरंगी पतंगें

हवा में उड़ रही थीं,

दूर-दूर तक आसमान की ओर

पेंच बढ़ा रही थीं।


अड़ोस-पड़ोस की छतों पर

लोग हर्षोल्लास से

पतंगें उड़ा रहे थे,

अद्भुत खुशी से

उनके चेहरे चमक रहे थे।


जो किसी और की पतंग काट गिराता,

उसका आनंद ही निराला था।

पर कुछ ही पलों में

जब उसकी अपनी पतंग कट जाती,

तो वही चेहरा

खिन्न और मायूस हो जाता।


यानि कुछ पल की खुशी,

और कुछ पल का दुःख।


मैं सोच रही थी

कितना बड़ा है यह आसमान,

हर एक की अपनी पतंग,

अपनी-अपनी डोर।


क्यों न सभी पतंगें

अपनी डोर के सहारे

आसमान में उड़ती जाएँ?

क्यों काटें हम

किसी और की पतंग?

क्यों उसके पतन का

उल्लास मनाएँ?


आज हम काटेंगे,

कल वह हमारी पतंग काटेगा

इससे क्या होगा लाभ?


कितना अच्छा हो

यदि सबकी पतंगें

आसमान में

और ऊँची उड़ती जाएँ,

सब शिखर तक पहुँचे।


सबके मन में

एक-दूसरे के लिए

परस्पर सहकारिता का भाव हो

तभी तो यह समाज

सचमुच स्वर्गतुल्य बन सकेगा।


– डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार



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