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Delhi News: लघु पत्रिकाओं में भारतीय संस्कृति का पक्ष : प्रो. आशुतोष

विश्व पुस्तक मेले में बनास जन का लोकार्पण

नया सवेरा नेटवर्क

दिल्ली। लघु पत्रिका आंदोलन साहित्य की प्रतिबद्धता और जनाकांक्षाओं का प्रतीक है जिसका संकल्प साहित्य और संस्कृति के पक्ष में काम करना है। बनास जन जैसी लघु पत्रिका डेढ़ दशक से भी अधिक समय से लगातार इस संकल्प को पूरा करने में जुटी हुई है। दलित लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो नामदेव ने बनास जन के सद्य प्रकाशित अंक का लोकार्पण करते हुए कहा कि अपने चरित्र में समावेशिता और उदारता से बनास जन ने साहित्य की विभिन्न धाराओं और विमर्शों को भी जगह दी है। उन्होंने कहा कि पुस्तक विरोधी समय में किसी लघु पत्रिका के पचासी अंक पूरे हो जाना एक उपलब्धि ही माना जाएगा। प्रो नामदेव ने लघु पत्रिका आंदोलन में पहल, वसुधा, तद्भव जैसी पत्रिकाओं के साथ बनास जन को भी रेखांकित करने योग्य बताया।  

आयोजन के मुख्य अतिथि इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के आचार्य प्रो आशुतोष मोहन ने कहा कि वे बनास जन के पहले अंक से ही लगातार इस यात्रा को देख रहे हैं जिसमें सच्चे मन से सामान्य पाठकों तक साहित्य को पहुँचाने का इरादा है। प्रो मोहन ने कहा कि भूमंडलीकरण के भयानक सांस्कृतिक हमले में भारतीय संस्कृति का पक्ष साहित्य ही रख सकता है और बनास जन जैसी लघु पत्रिकाएँ इस पक्ष को मजबूती से रख रही हैं। सुपरिचित आलोचक और राजकीय महाविद्यालय रानीवाड़ा के प्राचार्य प्रो हिमांशु पंड्या ने बनास जन के विभिन्न विशेषांकों की चर्चा करते हुए कहा कि गंभीर साहित्य को जन सामान्य तक पहुँचाने में प्रेमचंद और परसाई जैसे लेखकों ने अपने ढंग से प्रयास किये थे आज के दौर में जब मीडिया के पास साहित्य के लिए कोई स्थान नहीं बचा है तब लघु पत्रिकाएँ ही इस काम को कर रही हैं। उन्होंने बनास जन के फणीश्वरनाथ रेणु, भीष्म साहनी, त्रिलोचन और अमरकांत विशेषांकों को हिंदी अकादमिकी के लिए भी महत्त्वपूर्ण बताया।  

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लक्ष्मीबाई कालेज में हिंदी की आचार्य और दलित लेखिका डॉ नीलम ने बनास जन के ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित स्त्री आत्मकथा अंकों को यादगार बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विमर्श मनुष्यधर्मी ही है और इन विमर्शों का मानवीय पक्ष साहित्य से ही प्रकट होता है। उन्होंने इस कार्य में बनास जन के योगदान को प्रशंसनीय बताया। 

इससे पहले बनास जन के सम्पादक पल्लव ने बताया कि वर्ष 2008  से शुरू हुई यह यात्रा यदि हिंदी भाषा और साहित्य के पाठकों के लिए उपयोगी हुई है तो उनका प्रयास सार्थक है। अपने कार्य में सहयोग करने वाले लेखकों, पाठकों और सहयोगियों का आभार प्रकट करते हुए पल्लव ने कहा कि हिंदी क्षेत्र बहुत बड़ा है और हमारे प्रयास बेहद मामूली हैं। नयी पीढ़ी को साहित्य का पाठक बनाना आज भी कठिन चुनौती है। युवा शोधार्थी निधि सिंह ने अंक 86 में प्राकशित सामग्री की चर्चा करते हुए बताया कि शताब्दी के अवसर पर कृष्णा सोबती और रंगभूमि पर विशेष सामग्री इस अंक में दी गई है साथ ही भारतीय भक्ति साहित्य पर माधव हाड़ा, विनोद शाही, तृप्ति श्रीवास्तव, उज्ज्वल कुमार और देवीलाल गोदारा के आलेख अंक को उल्लेखनीय बनाते हैं। 

आयोजन में प्रकाशक मीरा जौहरी, स्त्रीवादी कार्यकर्ता प्रज्ञा जोशी सहित अनेक लेखक और पाठक उपस्थित थे। अंत में हिन्दी आलोचक राजेंद्र कुमार और वीरेंद्र यादव के आकस्मिक निधन पर दो मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि दी गई। लोकार्पण समारोह का संयोजन अभिनन्दन ने किया। 


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