अखिलेश बनना आसान नहीं
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| डाॅ. अखिलेश कुमार मिश्र |
कवि डाॅ.अखिलेश कुमार मिश्र के 61 वें जन्मदिन पर विशेष
नया सवेरा नेटवर्क
कवि, ग़ज़लकार ,गीतकार एवं मानस मर्मज्ञ डॉ.अखिलेश कुमार मिश्र का जन्म 27 जनवरी 1965 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में हुआ और बाल्यावस्था जनपद जौनपुर के रामपुर नद्दी गाॅंव में बीता। डाॅ. मिश्र के माता-पिता मानस कोकिला फूलकली मिश्रा एवं मानस किंकर पं.रवीन्द्रनाथ मिश्र रामचरितमानस के विद्वान थें। आपने प्रारम्भिक शिक्षा बी.एच.यू. प्रांगण में स्थित केन्द्रीय विद्यालय से प्राप्त की एवं बी.एच.यू. से बी.एससी.(ए.जी.), एम.एससी.(जैनटिक्स) तथा पी-एच.डी. जैनटिक्स की उपाधि 1992 में प्राप्त की। वैज्ञानिक के रूप में कार्य करते-करते डॉ. मिश्र ने जीवन की धारा बदली व बिहार प्रान्तीय सेवा में तीन वर्ष कार्य करने के पश्चात् उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं। डॉ.मिश्र जिलाधिकारी पीलीभीत रहते हुए गोमती उद्गम स्थल पर प्रशंसनीय कार्य किया।जिसके कारण आज भी पीलीभीतवासियों के स्मृति पटल पर मौजूद हैं। प्रदेश के प्रमुख विभागों में जैसे विशेष सचिव परिवहन, विशेष सचिव उच्च शिक्षा, सीईओ खादी ग्रामोद्योग , विशेष सचिव पिछड़ा वर्ग कल्याण रहें। राम कथा पार्क अयोध्या में भगवान् राम की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित रामोत्सव के अंतर्गत संगीतमय श्रीराम कथा 03-04 फरवरी 2024 में व्यास पीठ से कवि मिश्र ने रसमय कथा कही थी।प्रयागराज के महाकुम्भ 2025 में मानसकिंकर पण्डाल हजारों लोगों का आश्रय स्थल रहा।
वर्तमान में विशेष कार्याधिकारी उ.प्र. राज्य निर्वाचन आयोग,लखनऊ में सेवारत है एवं उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान के अध्यक्ष हैं।
कवि मिश्र की साहित्यिक यात्रा के संदर्भ में धर्मपत्नी मधु मिश्रा ने दुबई, शारजाह, सऊदी अरब, फिलीपिन्स,नेपाल जाने की बात की।
'यूॅं ही' डॉ. अखिलेश मिश्र का पहला कविता संग्रह है जिसमें पारिवारिक रिश्तों, ऐतिहासिक धरोहरों, प्रेम, भारतीय त्योहार,सामाजिक सरोकार, वर्तमान विसंगतियों को समेटे हुए है। उक्त कृति की भूमिका में रचयिता ने दसवीं कक्षा के हिन्दी अध्यापक मोहन लाल गुप्त के प्रति आभार प्रकट किए हैं। इसमें ग़ज़ल, कविता एवं मुक्तक संगृहीत हैं। मानवतावादी व्यक्तित्व की झलक इस संग्रह में देखने को मिलती हैं। साहित्य जगत् में उनका लोकप्रिय अशआर -
"ज़िन्दगी का क्या ठिकाना हो न हो।
कल भी ये मौसम सुहाना हो न हो...
जिस शहर में मैं बहुत मशहूर था।
कल वहाॅं का आबोदाना हो न हो.."
समाज में व्यक्ति मानवता का मुखौटा लगाए हुए घूमता है वह सामने कुछ और कहता है और पीछे करता कुछ और है। आज जहां लालसा, तृष्णा की प्रवृत्ति अधिक व्यापक होती जा रही है। बाज़ार घर में प्रवेश करता जा रहा। इस संदर्भ में कवि मिश्र की पंक्ति है -
"रोटी खरीद लाया है ईमान बेचकर ।
घर में बचा था बस यही सामान बेचकर ।।मुंशी,वकील,अहलमद,हाकिम औ पेशकार।
हिस्सा बॅंटेगा सबमें फरमान बेचकर ।।"
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| अश्वनी कुमार तिवारी |
रचनाकार समाज का जागरूक और संवेदनशील प्राणी होता है यही संवेदना रचना में सामाजिक दृष्टि को समाहित करती है। डाॅ. मिश्र समाज में व्याप्त जातिवाद ,धार्मिक पाखंड, संकीर्णताओं को अस्वीकार करते हुए समता, सहिष्णुता और मानवतावाद पर आधारित जीवन-दृष्टि का प्रतिपादन करते हैं। आपकी कथनी और करनी में जहाॅं एकरूपता है वही अध्ययन,मनन,चिन्तन और अनुभव रचना में देखने को मिलती है। 'भटकन' शीर्षक कविता की पंक्ति है:
"जीवन की आपाधापी में,
वो पाप कमा कर लाया है
ढलते यौवन में रोने को,
संताप कमा कर लाया है "
डाॅ. मिश्र की सामाजिक दृष्टि शाश्वसत प्रासंगिकता से युक्त है। उपर्युक्त पंक्तियों के केन्द्रीय भाव वर्तमान और भविष्य के लिए भी मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करते हैं।जिसके कारण कृति सार्वकालिक हो जाती है।
कवि का एक मार्मिक शेर हैं -
हर मौत पर रोना नहीं आता है ज़ार-ज़ार
हाॅं रो पड़ा ये देखकर ज़िन्दा है कैसे लोग
'बेटियाॅं' शीर्षक कविता में बेटी के सशक्त व्यक्तित्व का चित्रण किए है। 'लक्ष्मण', 'उठो उर्मिला' एवं 'पुरुष कौन ये शयन कक्ष में ' शीर्षक कविताओं में लक्ष्मण उर्मिला को केंद्र में रखकर नव्य विषयवस्तु से व्यापक दृष्टि का परिचय मिलता हैं। 'काली दीवाली' एवं 'होली' शीर्षक कविता में यह भारतीय पर्व समाज के श्रमिक वर्ग एवं विषादग्रस्त मानव के दृष्टिकोण उद्घाटित करती है तदनुकूल कविता में भारी भरकम बनावटी शब्दावली का प्रयोग न करके सहज, सुपरिचित शब्दों का प्रयोग करते हैं।
अत: यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि कवि डॉ.अखिलेश मिश्र अपने भाव और अनुभवों को व्यक्त करने में सफल रहे हैं। उनके इस भाव जगत् का वस्तु-जगत् में स्वागत होगा।
अश्वनी कुमार तिवारी
शोध छात्र, वीर बहादुर सिंह पूर्वाञ्चल वि.वि.,जौनपुर,उ.प्र.


