Bareilly News: आईवीआरआई ने रोहिलखंडी एवं वृन्दावनी गाय नस्लों का कराया पंजीकरण
निर्भय सक्सेना @ नया सवेरा
यह प्रमाणपत्र भारत सरकार के केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा डॉ. मंगी लाल जाट, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, आई सी ए आर तथा श्रीमती वर्षा जोशी, अपर-सचिव, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, भारत सरकार की गरिमामयी उपस्थिति में प्रदान किया गया। इस अवसर पर संस्थान के निदेशक डॉ. त्रिवेणी दत्त सहित अनेक गणमान्य अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का आयोजन ए. पी. शिंदे हॉल, एन ए एस सी कॉम्प्लेक्स, नई दिल्ली में किया गया।
समारोह में डॉ. राघवेंद्र भट्टा, उप महानिदेशक (पशुपालन विज्ञान), आई सी ए आर, डॉ. जी. के. गौर, सहायक महानिदेशक (पशु उत्पादन एवं प्रजनन), आई सी ए आर तथा डॉ. एन. एच. मोहन, निदेशक, राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो की उपस्थिति रही।
इस अवसर पर संस्थान के निदेशक डा त्रिवेणी दत्त ने बताया की रोहिलखंडी तथा वृन्दावनी नस्लों के पंजीकरण होने से इनके संरक्षण, संवर्धन तथा सुधार हेतु कार्य योजना तैयार करने में मदद मिलेगी तथा किसानों को भी विभिन्न सरकारी योजनाओं का बेहतर लाभ मिल पायेगा। उनहोने कहा की भविष्य में यह दोनों नस्लें बरेली मण्डल की बहुत अच्छी नस्ल साबित होगी तथा इससे इस क्षेत्र के पशुपालकों की आय में बढ़ोतरी होगी।
रोहिलखंडी गाय
रोहिलखंडी गाय मुख्यतः उत्तर प्रदेश के बरेली, बदायूँ एवं पीलीभीत जनपदों में पाई जाती है। वर्तमान में इसकी अनुमानित संख्या लगभग तीन लाख है। यह एक द्विउद्देशीय नस्ल है, जिसका रंग सफेद तथा आकार मध्यम होता है। यह नस्ल औसतन लगभग 210 दिनों तक प्रतिदिन लगभग पाँच लीटर दूध उत्पादन करती है।
इस नस्ल के नर पशु सामान्य बैलों की तुलना में खेत की जुताई एवं भार वहन में अधिक सक्षम होते हैं। रोहिलखंडी गाय इस क्षेत्र की गर्मी एवं आर्द्र जलवायु के अनुकूल है तथा किसान इसे कई पीढ़ियों से पालते आ रहे हैं। इसकी प्रजनन क्षमता उत्कृष्ट है और यह औसतन 8–10 ब्यात तक दूध उत्पादन में सक्षम होती है।
रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोधक क्षमता के कारण यह नस्ल अपेक्षाकृत कम बीमार पड़ती है, जिससे उपचार लागत भी कम होती है। रोहिलखंडी गाय देश की 55वीं तथा उत्तर प्रदेश की छठी पंजीकृत गाय नस्ल है।
इस नस्ल के पंजीकरण कार्य में डॉ. त्रिवेणी दत्त के नेतृत्व में डॉ. जी. के. गौड़, डॉ. रूपसी तिवारी, डॉ. अनुज चौहान, डॉ. बृजेश कुमार, डॉ. आयोन, डॉ. अमित कुमार तथा डॉ. श्रीकांत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वृन्दावनी गाय वृन्दावनी एक सिंथेटिक गाय नस्ल है, जिसे भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित किया गया है। यह देश की तीसरी पंजीकृत सिंथेटिक गाय नस्ल है। इस नस्ल का विकास चार विभिन्न नस्लों के क्रॉसब्रीडिंग के माध्यम से किया गया।
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वर्ष 2006 में इसे एच एफ, ब्राउन स्विस एवं जर्सी (विदेशी नस्लें) के 50–75 प्रतिशत तथा हरियाणा (स्वदेशी नस्ल) के 25–50 प्रतिशत अनुवांशिक गुणों के संयोजन से विकसित किया गया। इसके पश्चात 10 पीढ़ियों तक इंटर-से प्रजनन कार्यक्रम के माध्यम से इसके गुणों में स्थिरता लाई गई।
वृन्दावनी गाय का रंग सामान्यतः भूरा या काला होता है, जबकि कुछ पशु काले-सफेद मिश्रित अथवा बीज रंग के भी पाए जाते हैं। यह एक मध्यम आकार की नस्ल है, जिसका औसत दुग्ध उत्पादन एक ब्यात में 3000 से 3500 किलोग्राम है।
संस्थान द्वारा वृन्दावनी गायों का वितरण बरेली, पीलीभीत, शाहजहाँपुर एवं बदायूँ जिलों में किया गया है। आईवीआरआई के गाय एवं भैंस फार्म में इस नस्ल के उत्कृष्ट पशुओं का अनुवांशिक सुधार एवं संवर्धन किया जा रहा है। क्षेत्रीय आबादी के सुधार हेतु उत्कृष्ट वृन्दावनी सांडों के वीर्य का उपयोग किया जा रहा है।
वर्ष 2009 से 2025 के दौरान फील्ड स्तर पर कृत्रिम गर्भाधान हेतु वृन्दावनी सांडों की कुल 1,92,910 वीर्य डोज़ विभिन्न एजेंसियों को वितरित की जा चुकी हैं।
वृन्दावनी नस्ल के विकास एवं पंजीकरण कार्य में डॉ. जी. के. गौड़, डॉ. त्रिवेणी दत्त, डॉ. मुकेश सिंह, डॉ. ए. के. एस. तोमर, डॉ एस के सिंह, डॉ. अनुज चौहान, डॉ. सुब्रत घोष, डॉ. बृजेश कुमार तथा डॉ. मानस का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

