Article: प्रो. राजेन्द्र कुमार: एक छायादार चेतना के मूर्तिमान स्वरूप, जो स्मृतियों में सदैव जीवित रहेंगे
नया सवेरा नेटवर्क
इलाहाबाद की जिस मिट्टी में बहस की चमक, भाषा की तहज़ीब और साहित्य की आत्मीयता एक साथ साँस लेती रही है, आज वह मिट्टी कुछ अधिक सूनी हो गई है। आदरणीय गुरु, वरिष्ठ कवि, आलोचक और नवोदित साहित्यकारों के सहज अभिभावक प्रो. राजेन्द्र कुमार के देहावसान की सूचना केवल किसी एक व्यक्ति के चले जाने का समाचार नहीं है, यह अपने समय की एक पूरी बौद्धिक पीढ़ी के अगुवा के विदा हो जाने की करुण घोषणा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय और प्रयागराज शहर के वैचारिक जीवन में उनकी उपस्थिति जीवन की स्वाभाविक लय की तरह रही। वहाँ उनकी मौजूदगी छतनार वृक्ष सरीखी होती थी, ऐसी छाया जिसके नीचे किसी भी समय, किसी भी विषय पर, बिना किसी भय के बैठा जा सकता था और जहाँ मन थोड़ा अधिक स्वच्छ, भाषा कुछ अधिक जिम्मेदार और दृष्टि कुछ अधिक मानवीय हो जाती थी।
उनके जाने का दु:ख इसलिए भी अधिक गहरा है कि वह मात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष, प्रतिष्ठित साहित्यकार या चर्चित कवि और आलोचक भर नहीं थे। वह उस गंगा-जमुनी सांस्कृतिक चेतना के जीवित संवाहक थे, जिसमें ज्ञान का अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता का तेज होता है। विद्यार्थियों की साधारण से साधारण जिज्ञासाओं को भी वह जिस गम्भीरता और सम्मान के साथ सुनते थे, वह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी। वह ऐसे व्यक्ति थे, जो जितने बड़े विद्वान थे, उतने ही खुले मनुष्य, संवाद के लिए सहज रूप से उपलब्ध, सहमति और असहमति के लिए उदार तथा साहित्य के प्रति पूरी तरह समर्पित।
प्रो. राजेन्द्र कुमार का प्रभाव एक पूरी पीढ़ी की रचनात्मकता, आलोचनात्मक विवेक और नैतिक-बौद्धिक अनुशासन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। विद्यार्थियों के लिए वह सिर्फ पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले अध्यापक नहीं थे, वह साहित्य के जीवनपाठ के शिक्षक थे। पढ़ने लिखने का सलीका, बोलने की जिम्मेदारी, बहस की शालीनता और मनुष्य की गरिमा, ये सब उनके अध्यापन के वे मौन पाठ थे, जो बिना किसी घोषणा के गहरे उतर जाते थे।
उनका रचनात्मक संसार भी इसी गरिमा का स्वाभाविक विस्तार है। उनके चर्चित काव्य संग्रह, ऋण गुणा ऋण, लोहा-लक्कड़, हर कोशिश है एक बगावत, उदासी का ध्रुपद, के भीतर एक ऐसी मनुष्यता धड़कती है, जो समय की कठोरता से भागती नहीं, बल्कि उसे समझती और सहती है। वहाँ पीड़ा आत्मदया में नहीं बदलती, वह एक नैतिक आग्रह का रूप लेती है। उनकी आलोचनात्मक कृतियाँ, प्रतिबद्धता के बावजूद, कविता समय असमय, आलोचना आसपास, कथार्थ और यथार्थ, शब्द घड़ी में समय, हिंदी आलोचना की उस धैर्यवान परम्परा की याद दिलाती हैं, जो शोर नहीं करती, किन्तु दूर तक असर करती है। अभिप्राय जैसी साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन और बहुवचन के कुछ अंकों का सम्पादन उनके लिए किसी व्यक्तिगत उपलब्धि का प्रश्न नहीं था, यह साहित्यिक सार्वजनिकता के प्रति एक गहरी नैतिक जिम्मेदारी का निर्वाह था। उनके लिए साहित्य निजी प्रदर्शन नहीं, बल्कि साझा विरासत था।
इन सबके बीच सबसे अधिक स्मरणीय उनका अध्यापक भाव है, वह भाव, जो किसी को छोटा नहीं करता, किसी को हतोत्साहित नहीं करता और किसी की सम्भावना को नकारता नहीं। प्रायः देखा जाता है कि कुछ लोग मंच पर बड़े दिखते हैं, किन्तु बातचीत में सिकुड़ जाते हैं। प्रो. राजेन्द्र कुमार का कद बातचीत में और अधिक विस्तार पाता था। वह चर्चा को विजय में नहीं बदलते थे, वह उसे समझ में रूपान्तरित करते थे। उनकी उपस्थिति में विभागीय संगोष्ठियाँ मात्र औपचारिक आयोजन नहीं लगती थीं, जीवित संवाद परम्परा का अनुभव कराती थीं। यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि बीमारी और उम्र के कठिन पड़ाव में भी उनकी सक्रियता लोगों को चकित करती रही। वह बिना सहारे मंच तक जाते, पोडियम पर खड़े होकर बोलते, मानो यह रेखांकित कर रहे हों कि साहित्य का सम्बन्ध देह की सुविधा से नहीं, मन की दृढ़ता से होता है।
दु:ख की यह अनुभूति इसलिए भी अधिक सघन है कि वह लम्बे समय से गम्भीर बीमारी से जूझ रहे थे। बीमारी मात्र शरीर को नहीं तोड़ती, वह मनुष्य की रोजमर्रा की स्वतन्त्रताओं को धीरे-धीरे छीन लेती है, पढ़ने की क्षमता, लिखने की शक्ति, एकाग्रता, स्वाद, नींद और इच्छा। जब ऐसा व्यक्ति, जिसकी पहचान ही पढ़ने-लिखने और सृजन से बनी हो, वही न कर पाए, तो जीवन एक अपूरणीय रिक्तता में बदलने लगता है। मिलने वालों से वह प्रायः कहते थे कि अब जीना नहीं चाहता, यह जीना कोई जीना नहीं है, न पढ़ सकता हूँ, न लिख सकता हूँ। यह वाक्य मात्र निराशा नहीं था, यह उस रचनात्मक मन के भीतर टूटने की पीड़ा की अभिव्यक्ति थी, जो मौन रूप से असह्य कष्ट सहता रहा। ऐसे क्षणों में शब्द अपर्याप्त हो जाते हैं और हम यह समझ पाते हैं कि कुछ दु:ख भाषा की सीमा के बाहर होते हैं।
बीमारी के बीच भी जीवन के सांस्कृतिक उत्सव से उनका सम्बन्ध बना रहा। वह अन्त तक जीवन के पक्ष में खड़े रहे, चाहे जीवन ने उन्हें कितनी ही तकलीफें क्यों न दी हों। यही उनकी जिजीविषा थी, अदम्य, सधी हुई और बिना किसी प्रदर्शन के।
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कभी-कभी मृत्यु किसी व्यक्ति को रोकती नहीं, वह मात्र उसके देह-रूप को विराम देती है, उसके विचार, उसका स्नेह और उसकी भाषा स्मृतियों में, पुस्तकों में और विद्यार्थियों के मन में जीवित रह जाते हैं।
उनके अन्तिम निर्णय में भी एक असाधारण नैतिक ऊँचाई दिखाई देती है। उन्होंने देहदान की लिखित इच्छा व्यक्त की थी और उसी के अनुरूप परिवार वालों के द्वारा उनके पार्थिव शरीर को मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज को समर्पित किया गया। मृत्यु के क्षण में भी किसी अन्य के जीवन के काम आना केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण जीवनदृष्टि है। यह उस शिक्षक का अन्तिम पाठ है, जो जीवनभर मूल्यों की शिक्षा देता रहा कि मेरा शरीर भी किसी के काम आए।
कुछ लोग शहरों में रहते हैं और कुछ लोग शहरों को अपने भीतर जीवित रखते हैं। प्रो. राजेन्द्र कुमार जी दूसरी श्रेणी के मनुष्य थे। वह इलाहाबाद की उस बहसधर्मिता के प्रतीक थे, जो कटुता में नहीं बदलती, उस बौद्धिकता के प्रतिनिधि थे, जो जनजीवन से कटी हुई नहीं होती और उस साहित्यिकता के वाहक थे, जो दम्भ से रहित होती है। उनके जाने से रिक्तता इसलिए अधिक गहरी प्रतीत होती है कि वह इलाहाबाद के साहित्यिक गुरुओं में जीवित अन्तिम छायादार व्यक्तित्वों में थे, जिनकी उपस्थिति मात्र से एक पूरी पीढ़ी को यह भरोसा मिलता था कि साहित्य का घर अभी भी भरापूरा है।
उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम भाषा को विषैला होने से बचाएँ, बहस को अपमान में न बदलने दें, साहित्य को आत्मप्रचार का साधन न बनाएँ और विद्यार्थियों के भीतर उस भरोसे को जीवित रखें, जिसे उन्होंने वर्षों तक अपने स्नेह से सींचा। उनकी रचनाएँ, उनकी आलोचनाएँ, उनका सम्पादकीय श्रम और सबसे बढ़कर उनका मानवीय आचरण हमारे लिए एक नैतिक मानक की तरह सदैव उपस्थित रहेगा।


