Poetry: कुर्क नीलामी हो जाए
कुर्क नीलामी हो जाए
पुस्तक से दुश्मनी रही है, कलम नहीं पकड़ी तलवार।
एक-एक से चुनकर आए, उनका सदन वही सरकार।।
पढ़े - लिखे जो जीवनभर, वे नहीं बनाने के काबिल।
आये हैं कानून बनाने, तोड़ के आए जो सौ बार।।
कोट पहन मौसेरे भाई, सच को झूठ बना देंगे।
मिटे सबूत गवाह मर गए, बचा डाकुओं का सरदार ।।
हम गरीब-मजलूमों को, साधने के लिए है कानून।
इन लोगों से कांप रहे हैं, पुलिस दरोगा थानेदार।।
दीवारों में खुद को चुनकर, बैठ गए सब अच्छे लोग।
सत्य कहां टिकने पायेगा, झूठों की है बड़ी कतार।।
दिग्दिगंत अब गूंज रहा है, इनके ही पाखण्डों से।
सत्य अहिंसा परम् धर्म को, भेज दिए हैं सागर पार।।
कमर तोड़ती मंहगाई से, मान बचाएं मर जाएं।
इनको फर्क नहीं पड़ता है, भले मच रही हाहाकार।।
करते रहो फैसले, हम मनमानी करने में माहिर।
हम घाटा क्यों सहने जाएं, हमीं चोर हम साहूकार।।
पढ़े - लिखे नौकरी करें, वे राजा बनकर राज करें।
शिक्षा - मंदिर के महन्थ वे, शिक्षा बेच रहे बाजार।।
ले लो कर्ज हजार-लाख तो, कुर्क नीलामी हो जाए।
कर्ज डकारो अरबों-खरबों, माफ करेंगे चौकीदार।।.
डाॅ. प्रमोद श्रीवास्तव ”अनंग” , ग़ाज़ीपुर
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