Jaunpur News: शौक से शुरू हुई राह, अब पेशेवर कलाकार बनकर चमका रहे नाम
प्रतिमाओं की कीमत 10 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक
चेतन सिंह @ नया सवेरा
बरसठी, जौनपुर। नवरात्र पर्व का शुभारंभ 22 सितंबर से होने जा रहा हैं। पूरे क्षेत्र में उल्लास और तैयारियों का माहौल दिखाई देने लगा है। पूजा-पंडालों की सजावट से लेकर मंदिरों की रंगाई-पुताई तक हर जगह लोग अपने-अपने कार्यों में जुटे हैं। वहीं क्षेत्र के हसिया गांव स्थित जय मां दुर्गा मूर्ति कला केंद्र पर मूर्तिकारों की टीम भी दिन-रात प्रतिमाओं के निर्माण में व्यस्त है। कला केंद्र का नेतृत्व 25 वर्षीय युवा मूर्तिकार लाल बहादुर कर रहे हैं। उनके साथ सिकंदर बिंद और पंकज जैसे सहयोगी भी लगातार काम में जुटे हैं। इस बार उन्होंने दो दर्जन से अधिक मां दुर्गा की प्रतिमाओं को तैयार किया है, साथ ही अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी विशेष मेहनत और बारीकी से गढ़ रहे हैं मिट्टी, बांस, कपड़ा और रंग-रोगन के प्रयोग से बनी ये प्रतिमाएं कलात्मकता और भक्ति का अद्भुत संगम पेश कर रही हैं।
10 वर्षों तक उन्होंने आकर्षक तरीके से मूर्तियां बनाने की सीखी कला
लाल बहादुर बताते हैं कि बढ़ती महंगाई के कारण इस वर्ष प्रतिमाओं की कीमत 10 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक रखी गई है, जो ऑर्डर और आकार के हिसाब से तय होती है। उन्होंने कहा कि बचपन से ही उन्हें कलाकारी का शौक रहा है। घर पर मिट्टी से तरह-तरह की आकृतियां बनाना उनकी आदत थी। धीरे-धीरे इसी रुचि ने उन्हें पेशेवर मूर्तिकार बना दिया।
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लाल बहादुर ने बताया कि लगभग 10 वर्षों तक उन्होंने आकर्षक तरीके से मूर्तियां बनाने की कला सीखी। इसके बाद 3 वर्ष पहले उन्होंने अपने ननिहाल में रहकर जय माँ दुर्गा मूर्ति कला केंद्र की शुरुआत की और अब इसे स्वयं संचालित कर रहे हैं। इस दौरान वे नवरात्र से चार-पांच माह पहले प्रतिमाओं को बनाने की तैयारियों में जुट जाते हैं और आज भी रोज़ाना 15 से 16 घंटे इस कार्य को समर्पित करते हैं।
मिट्टी और रंग की महंगाई ने बढ़ाई चुनौतियां
उन्होंने स्वीकार किया कि इस बार मिट्टी और रंग की महंगाई ने चुनौतियां बढ़ाई हैं, लेकिन कला और भक्ति से कोई समझौता नहीं किया गया। परिवार के सदस्य भी रंगाई-पुताई और कपड़ा चिपकाने जैसे कार्यों में सहयोग करते हैं। उनकी प्रतिमाएं न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि आस-पास के क्षेत्रों अब मांग हो रही हैं, जिससे उन्हें रोज़गार के साथ-साथ पहचान भी मिल रही है। लाल बहादुर का कहना है कि प्रतिमा बनाना सिर्फ जीविकोपार्जन का साधन नहीं बल्कि माँ दुर्गा की साधना और आस्था से जुड़ी सेवा भी है। भविष्य में वे चाहते हैं कि नई पीढ़ी भी इस कला से जुड़े और परंपरागत धरोहर को आगे बढ़ाए। इस बार नवरात्र में भी ये प्रतिमाएं क्षेत्र के दर्जनों पूजा-पंडालों की शोभा बढ़ाने जा रही है।
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