शारदीय नवरात्रि 2025 - गज पर सवार होके आजा शेरांवांलिएं - शेरावांलिएं मां ज्योतावांलिएं
नवरात्रि अब केवल भारत का त्योहार नहीं रहा, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन गया है।
शारदीय नवरात्रि पर्व याद दिलाता है कि महिला केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि समाज की रक्षक और ऊर्जा का स्रोत भी है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
नया सवेरा नेटवर्क
साथियों बात अगर हम इस बार 22 सितंबर से 1 अक्टूबर 2025 तक माता की सवारी और उसके महत्व की करें तो,इसबारशारदीय नवरात्रि की शुरुआत सोमवार से हो रही है और जब सोमवार के दिन से नवरात्रि शुरू होती है तो माता का वाहन हाथी होता है। हाथी पर सवार होकर माता का आगमन अधिक वर्षा उत्सव कष्टों से मुक्ति,सुख समृद्धि का संकेत देता है। वैसे तो अलग- अलग वार याने दिन के अनुसार नवरात्रि में मां दुर्गा के वाहन डोली, नाव, घोड़ा, भैंसा, मनुष्य व हाथी होते हैं, मान्यता के अनुसार यदि नवरात्रि सोमवार या रविवार से शुरू हो रही है तो मां दुर्गा का वाहन हाथी होता है, जो अधिक वर्षा के संकेत देता है। वहीं यदि नवरात्रि मंगलवार और शनिवार शुरू होती है, तो मां का वाहन घोड़ा होता है, जो सत्ता परिवर्तन का संकेत देता है। इसके अलावा गुरुवार याशुक्रवार से शुरू होने पर मां दुर्गा डोली में बैठकर आती हैं जो रक्तपात, तांडव, जन-धन हानि का संकेत बताता है। वहीं बुधवार के दिन से नवरात्रि की शुरुआत होती है, तो मां नाव पर सवार होकर आती हैं। नाव पर सवार माता का आगमन शुभ होता है। अगर नवरात्रि का समापन रविवार और सोमवार के दिन हो रहा है, तो मां दुर्गा भैंसे पर सवार होकर जाती हैं, जिसे शुभ नहीं माना जाता है। इसका मतलब होता है कि देश में शोक और रोग बढ़ेंगे।वहीं शनिवार और मंगलवार को नवरात्रि का समापन हो तो मां जगदंबे मुर्गे पर सवार होकर जाती हैं। मुर्गे की सवारी दुख और कष्ट की वृद्धि को ओर इशारा करता है। बुधवार और शुक्रवार को नवरात्रि समाप्त होती है, तो मां की वापसी हाथी पर होती है,जो अधिक वर्षा को ओर संकेत करता है। इसके अलावा यदि नवरात्रि का समापन गुरुवार को हो रहा है तो मां दुर्गा मनुष्य के ऊपर सवार होकर जाती हैं, जो सुख और शांति की वृद्धि की ओर इशारा करता है।
साथियों बात अगर हम नवरात्रि के प्रत्येक दिन की देवी और पूजा को समझने की करें तो (1)प्रथम दिन-शैलपुत्री,पर्वतराज हिमालय की पुत्री, शक्ति और दृढ़ता का प्रतीक।(2)द्वितीय दिन- ब्रह्मचारिणी - तप, संयम और भक्ति की देवी। (3) तृतीय दिन-चंद्रघंटा-शौर्य और साहस का स्वरूप (4) चतुर्थी- कूष्मांडा- सृष्टि की अधिष्ठात्री, उर्जा की देवी।(5) पंचमी- स्कंदमाता- मातृत्व और करुणा का प्रतीक।(6) षष्ठी-कात्यायनी-युद्ध और साहस की अधिष्ठात्री।(7)सप्तमी - कालरात्रि-भय को नष्ट करने वाली शक्ति।(8)अष्टमी- महागौरी - शुद्धता और मोक्ष की देवी।(9) नवमी- सिद्धिदात्री-सिद्धियों की अधिष्ठात्री।10)दशमी-विशेष पूजन (विजयादशमी)-दुर्गा विसर्जन, शक्ति की विजय और जीवन में संतुलन।
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साथियों बात कर हम कन्याओं और देवी के शास्त्रों की पूजा को समझनें की करें तो,अष्टमी को विविध प्रकार से मां शक्ति की पूजा करें, इस दिन देवी के शस्त्रों की पूजा करनी चाहिए, इस तिथि पर विविध प्रकार से पूजा करनी चाहिए और विशेष आहुतियों के साथ देवी की प्रसन्नता के लिए हवन करवाना चाहिए. इसके साथ ही 9 कन्याओं को देवी का स्वरूप मानते हुए भोजन करवाना चाहिए, दुर्गाष्टमी पर मां दुर्गा को विशेष प्रसाद चढ़ाना चाहिए। पूजा के बाद रात्रि को जागरण करते हुए भजन, कीर्तन, नृत्यादि उत्सव मनाना चाहिए, 2 साल की कन्या को कुमारी कहा जाता है,इनकी पूजा से दुख और दरिद्रता खत्म होती है। 3 साल की कन्या त्रिमूर्ति मानी जाती है, त्रिमूर्ति के पूजन से धन- धान्य का आगमन और परिवार का कल्याण होता है।4 साल की कन्या कल्याणी मानी जाती है, इनकी पूजा से सुख-समृद्धि मिलती है। 5 साल की कन्या रोहिणी माना गया है. इनकी पूजन से रोग-मुक्ति मिलती है। 6 साल की कन्या कालिका होती है. इनकी पूजा से विद्या और राजयोग की प्राप्ति होती है। 7 साल की कन्या को चंडिका माना जाता है. इनकी पूजा से ऐश्वर्य मिलता है। 8 साल की कन्या शांभवी होती है. इनकी पूजा से लोकप्रियता प्राप्त होती है। 9 साल की कन्या दुर्गा को दुर्गा कहा गया है. इनकी पूजा से शत्रु विजय और असाध्य कार्य सिद्ध होते हैं। 10 साल की कन्या सुभद्रा होती है। सुभद्रा के पूजन से मनोरथ पूर्ण होते हैं और सुख मिलता है। पूरे वर्ष में,चार नवरात्रि मनाई जाती है। यह नवरात्रि शारदीय होगी, जो आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक मनाई जा रही है। इस दौरान, भक्त मां दुर्गा और उनके नौ अवतारों - नवदुर्गाओं की पूजा करते हैं। यह त्यौहार नौ दिनों तक मनाया जाता है, इसलिए सही तिथियों और कलश स्थापना के सही मुहूर्त को जानना आवश्यक है। नवरात्रि के पहले दिन ही कलश स्थापना की जाती है। मान्यता है कि कलश स्थापना मुहूर्त में ही करनी चाहिए, क्योंकि नौ दिनों यह देवी के स्वरूप में आपके निवास स्थान में विराजमान रहता है।
साथियों बात अगर हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर परनवरात्रि उत्सव 22 सितंबर से 1 अक्टूबर 2025 की करें तो,गुजरात-गरबा और डांडिया का वैश्विक प्रसिद्ध आयोजन।पश्चिम बंगाल-दुर्गा पूजा, पंडाल और कला का अद्भुत संगम।उत्तर भारत- रामलीला और दशहरा उत्सव।
दक्षिण भारत-गोलु प्रदर्शनी, भक्ति और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ। दुनिया में नवरात्रि- आज प्रवासी भारतीय समुदाय पूरी दुनिया में नवरात्रि को मनाता है।अमेरिका और कनाडा-गरबा नाइट्स और दुर्गा पूजा के विशाल आयोजन।ब्रिटेन-लंदन में दुर्गा पूजा पंडाल अंतरराष्ट्रीय आकर्षण।ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड-भारतीय प्रवासी समुदाय का सांस्कृतिक उत्सव।खाड़ी देश-दुबई,अबू धाबी और दोहा में विशाल गरबा महोत्सव मनाया जा रहा है।नवरात्रि अब केवल भारत का त्योहार नहीं रहा,बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन गया है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि 2025 की शारदीय नवरात्रि अपनी 10 दिवसीय विशेषता, हाथी पर माता दुर्गा के आगमन और वैश्विक स्तर पर उत्सव के आयोजन के कारण ऐतिहासिक महत्व रखती है।यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक साधना और आत्मबल में निहित है।आज की दुनिया में नवरात्रि केवल धार्मिक पर्व न होकर सांस्कृतिक एकता, स्त्री सम्मान, पर्यावरणीय जागरूकता और वैश्विक भारतीयता का प्रतीक बन चुकी है।
-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318


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