Poetry: प्रेम से...जी-भर के.....!
नया सवेरा नेटवर्क
प्रेम से...जी-भर के.....!
देखो तो....!
बाजार अवध का ज़नाब....
आम के दाम गिरे हुए हैं धड़ाम...
फलों का राजा आम.....!
हो गया है आज यहाँ बेहद आम....
बीते दिनों दशहरी ने....!
कुछ हाथ-पाँव थे पसारे....
पर जल्द ही....हो गया वह यहाँ बेचारा..
लंगड़ा तो तेज़ी से यहाँ....!
सरपट दौड़ रहा है प्यारे.....
सच मानिए तो लोगों में....!
झूठ के लिए बदनाम हो गया है...
चौसा को चूसने की.....!
कवायद अभी जारी है....
मिठाई का यहाँ तो....इस समय....
काम तमाम सा हो गया है....
आम के लिए यहाँ....!
कहीं दिखती ही नहीं मारा-मारी,
हर किसी का झोला....!
हुआ है यहाँ आम से ही भारी...
यदि कहीं रिश्तेदारियों में प्रेम बश....
पहुँच गया लखनऊ का आम....तो...
लोग दिखाते हैं अजीब सी लाचारी...
देखो तो प्यारे....यहॉं गाँव में भी....!
आज आम को....कोई पालता नहीं....
भूल कर भी....अब इसे....
भूसे में कोई डालता नहीं....
सड़कों पर बिखेर दिए हैं,
बड़े व्यापारियों ने आम.....
कहते हैं....सुन लो ज़नाब....
मिल नहीं रहे हैं अच्छे से इनके दाम..
दाल से तो कब का हुआ दूर था
चटनी से भी होती नहीं है....!
अब....आम भाई की राम-राम....
कुछ इस तरह की तौहीनियों से....!
जूझ रहा आज यहाँ आम है...और...
घूम-घूम के कह रहा है कि....!
फालतू में ही मेरा बड़ा नाम है....
इसके उलट प्यारे...गौरतलब है कि..
यहाँ खुश भी दिख रहा आम है...
क्योंकि...आम के लिए आज...!
यहॉं कोई नहीं मोहताज़ है....
एक बात और जो उसे है मालूम
कि....जानते सभी हैं यहॉं
कि....राजा की पहुँच तो....!
आम-जन तक होनी ही चाहिए....
परेशानियाँ कुछ भी हों.....!
मज़बूती से....सामना उसका....
करना ही चाहिए....
इसी लिए कह रहा हूँ पाठकों....
इसे आप फलराज की....!
तौहीनी या बेचारगी न मानिए....
सुलभ है जो यहॉं आम आज
आम आदमी के लिए....
बस इसकी मिठास का....!
आप सभी आनन्द लीजिए....
कोसिए न इस आम को....
बस भूल जाइए कुछ दिनों के लिए
आप शाम के जाम को....क्योंकि...
हो न हो दिन कभी ऐसा आ जाये....
कि....तरस जाएं आप सभी.....!
चूसने को आम को...
सलाह एक नेक मेरी मानिए सरकार,
दुत्कारिये नहीं इस प्यारे आम को....
बाल्टी में भिगोकर...सुबह-शाम...!
प्रेम से....जी-भर के....
चूसिये या खाइये आम को....
रचनाकार.....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ
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