Poetry: आज अपने गाँव कसनहीं के बगीचे में, मन मोह लियो अंमराई ने | Naya Sabera Network
नया सवेरा नेटवर्क
आज अपने गाँव कसनहीं के बगीचे में, मन मोह लियो अंमराई ने
खिले हसरत के दिल में हैं हजारों फूल फागुन में।।
करकते हैं कलेजे में नुकीले शूल फागुन में।।
सम्हल कर दूर ही रहना भरोसा कुछ नहीं दिल का-
कहीं ऐसा न हो,हो जाये, कोई भूल फागुन में।।
हुई खुब झूम कर रंगों की कल बरसात फागुन में।।
ये होली लेके आई खुशियों की बारात फागुन में।।
निखर आया है जड़ चेतन उमंगें हैं तरंगें हैं-
उमड़ आया मेरे दिल में भी है ज़ज़्बात फागुन में।।
दहकते हैं खिले टेशू सघन अंगार फागुन में।।
भ्रमर कलियों से फूलों से करें मनुहार फागुन।।
प्रतिक्षारत मेरी आंखे चले आओ कहाँ हो तुम-
मुहब्बत का करेंगे खुल के हम इज़हार फागुन में।।
कली फूलों का मौसम है यही उद्गार फागुन में।।
उमंगो की तरंगों की है उमड़ी धार फागुन में।।
चले आओ जहाँ भी हो, विकल हैं दिल तुम्हारे बिन-
लुटायेंगे मुदित मन प्यार और दुलार, फागुन में।।
लगा कर हाथ में मेंहदी महावर पांव फागुन में।।
कभी सज धज के आओ तो हमारे गाँव फागुन में।।
कमी महसूस हम होने नहीं देगें तपिश तुम को-
गिरीश, जौनपुर।
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