Poetry: अब तो तन्हाई से डर लगता है | Naya Savera Network
अब तो तन्हाई से डर लगता है
कुछ सामायिक मुक्तक
अब तो तन्हाई से डर लगता है।।
अपनी परछाईं से डर लगता है।।
कोई दुश्मन नहीं बाहर मेरा-
भाई को भाई से डर लगता है।।
असंभव है कपट छल से सुकूं ना चैन पाओगे।।
निगल जायेगी दलदल हवश में गर डूब जाओगे।।
मुखौटे में न खो जाये तुम्हारा रूप रंग चेहरा-
मुखौटे पर मुखौटा यार कब तक तुम लगाओगे।।
शानी नहीं है दुनियाँ में सचमुच ईमान का।।
सम्मान नहीं करते लोग विधि विधान का।।
खाई है कशम जिसनें कर्तव्य भूल कर-
खिल्ली उड़ा रहे हैं वही संविधान का।।
सुहानी रात होती है सुहाना भोर होता है।।
चंहकते हैं मधुर स्वर चंहचहांहट शोर होता है।।
किसी को कम समझने कि कभी भी भूल मत करना-
समय बलवान होता है समय कमज़ोर होता है।।
पोशीदा अब कहाँ है पर्दा उठा दिया।।
रंग रूप और चेहरे को अपने दिखा दिया।।
हमनें तो मोतियों की तरह आंख में पाला-
तुमनें तो अपने आप को से खुद को गिरा दिया।।
इस कदर आकाश का उड़ता परिन्दा हो गया।।
हर जुबां पर चढ़ गया मसहूर बंदा हो गया।।
मिट नहीं सकता कभी कालिख मिटाकर देखिये-
दाग दामन पर लगा किरदार गंदा हो गया।।
एडवोकेट गिरीश श्रीवास्तव, जौनपुर।