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#Article: जन्माष्टमी की शुभकामनायें और साथ ही चिंतन भी | #NayaSaveraNetwork



नया सवेरा नेटवर्क

आज "श्रीकृष्ण जन्मोत्सव" है.. योगेश्वर.. कर्मयोगी.. सोलह कलाओं से युक्त "पूर्णावतार" .. सम्पूर्ण जीवन सक्रिय.. संघर्षशील रह कर भी वे बाधाओ से विचलित नहीं हुए.. ज़ब जहाँ रहे, पूरे मन.. प्राण.. सम्पूर्ण सामर्थ्य उस कार्य सिद्धि में समर्पित कर दी और सफल रहे.. जो भी किया, जैसा किया.. अपने कौशल, तर्कशक्ति से उसे ही नीति संगत सिद्ध करने में सफल रहे.. इन सबके बीच भी वे प्रेम.. प्यार की सार्वभौमिक बयार बहाने में भी सक्षम रहे, उनका सम्पूर्ण जीवन शुष्क नहीं रसमय रहा.. खूब सांसारिक सम्बन्धो का भी सफलता पूर्वक निर्वाह कर सके.. विश्व के तत्कालीन श्रेष्ठ.. वरिष्ठ.. महनीय व्यक्तित्वों के समक्ष अपने सारे कृतित्व को धर्मसंगत स्वरूप में व्याख्यायित..प्रस्तुत कर सके..

  योगेश्वर "कृष्ण" ने सब कुछ पाया तो.. लेकिन सभी कुछ उनसे छूटते भी रहा.. क्या नहीं छूटा.. शैशव में ही जननी छूटी.. फिर जहाँ गए वे पालनहार छूटे.. गोकुल.. मथुरा.. वृन्दावन.. सभी तो छूट गया.. ग्वाल - बाल .. राधा..रुक्मणि.. देवकी.. यशोदा.. सुदामा.. कौरव.. पाण्डव.. साथी - संगी, मित्र.. यहाँ तक कि भाई भी कहाँ साथ रह पाए.. कोई "कन्हैया" से मिल पाया.. तो कोई "नन्द गोपाल" को याद करता रहा.. किसी को वे "कृष्ण" के रूप में दिखे तो किसी को "द्वारिकाधीश" के रूप में दिखे..

   समग्र रूप में कौन देख सका.. जान सका, उस "नटवर नागर" को ❓️
   सभी के सामने अलग - अलग रूप.. क्रिया कलापों के साथ प्रस्तुत होकर भी वे सबके "अपने" भी बने रहे..
  जीवन भर सब त्यागते.. छोड़ते भी सब प्राप्य का आभास दिलाने में भी सफल ही रहे..
   सब छूट जाने पर भी प्रसन्न रहने की कला में पारंगत थे वे "नन्द लाल" ..
  अभीष्ट प्राप्ति हेतु सारी सामर्थ्य लगा देना और फिर छूटने पर बगैर निराश - हताश हुए निर्विकार भाव से उत्साह पूर्वक फिर अगले लक्ष्य की और बढ़ चलना..

 यही तो है 💥"कृष्ण"💥 हो जाना.. 
   सहज़.. सामान्य मानवीय क्षमता ज़ब कहीं थकने लगती है तब वह..वहाँ अवतार के लौकिक स्वरूप में देवत्व स्थापित कर उसके अत्यंत कठिन.. व्रती, संकल्पी चरित्र का अनुसरण करने से बचाव का मार्ग ढूंढ लेती है,
   यही तो हुआ "कृष्ण" के साथ.. वे सब कुछ पाए तो लेकिन लोकाचरण के समक्ष सब खो बैठे, उनके जीवन काल में कौन आत्मसात कर सका "गीता के ज्ञान" को .. और हम भी लोक जीवन में "कृष्ण" की कर्मयोग परम्परा.. संस्कार.. जीवन माधुर्य.. को ही खो बैठे..
   हमने उन्हें अवतार.. "भगवान" बना दिया ताकि उस चरित्र का अनुकरण.. अनुसरण करने की सम्भावना ही समाप्त हो जाये और हम अपनी अकर्मण्यता को आवृत्त कर सकें, मानव की सीमाओं के रूप में..

लेकिन फिर भी "कृष्ण तो कृष्ण हैं" वे कल भी थे.. आज भी हैं.. सदा रहेंगे.. यह विश्व उन्हें भुला ही नहीं सकता यही तो है "अमरत्व"..

वे अपने साथ ही अपने जनक माँ - पिता.. पालक.. सखा.. सभी को अविस्मरणीय बना गए..

आज सिर्फ उनका पूजन .. वन्दन ही नहीं बल्कि उनके चित्र के साथ "चरित्र पर भी चिंतन" करने का अवसर है.. क्यों हम आज हजारों वर्ष बाद भी उन्हें स्मरण करते हैं.. ❓️

क्या उनके जीवन दर्शन से.. उनके क्रिया कलापोँ से..अभीष्ट प्राप्ति हेतु रोम - रोम से समर्पित हो जाना ताकि असम्भव खुद ही "असम्भव" हो जाये.. गीता ज्ञान.. कर्मयोग सिद्धांत हम कुछ सीख सकेंगे..
तभी तो आज का यह उत्सव सार्थक होगा.. अन्यथा मात्र मनोरंजन बन कर रह जायेगा..
हाथी-घोड़ा-पालकी
जय कन्हैया लाल की
श्रीहरि वाणी, कानपुर।

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