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बरसाना : आज भी होता है राधाकृष्ण की मौजूदगी का अहसास | #NayaSaveraNetwork

बरसाना : आज भी होता है राधाकृष्ण की मौजूदगी का अहसास | #NayaSaveraNetwork

सुरेश गांधी @  नया सवेरा 

मथुरा और वृंदावन भले ही भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली हो लेकिन बरसाना को राधा रानी के लिए जाना जाता है। यहीं पर राधा का जन्म हुआ था. जो राधा कृष्ण के प्रेम का प्रमुख केन्द्र बिन्दु है. आज भी यहां का राधा रानी मंदिर इसकी कहानी कहता है। यह मंदिर राधा रानी को समर्पित है। यहां एक साथ राधा कृष्ण की पूजा की जाती है। मंदिर भानुगढ़ पहाड़ी की चोटी पर है। ढाई सौ मीटर की ऊंचाई बने इस मंदिर से राधाष्टमी और लठमार होली खेली जाती है, जिसे देखने भारत ही नहीं सात समुंदर पर से भी सैलानी पहंचते है। इस मंदिर को बरसाने की लाड़ली का मंदिर और राधा रानी का महल भी कहा जाता है। बता दें, राधाकृष्ण ने नंदगांव-बरसाना में बचपना की लीलाएं की हैं। इसमें से एक लठामार होली प्रमुख है, जिसे अभी दोनों गांव के लोग जीवंत किए हुए हैं। आज भी होली खेलने के दौरान राधाकृष्ण के होने का अहसास होता है। राधा भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति एवं निकुंजेश्वरी मानी जाती हैं। इसलिए राधा किशोरी के उपासकों का यह अतिप्रिय तीर्थस्थल  है। लट्ठमार होली में राधारानी के गांव बरसाने की गोपियां और नंदगांव के ग्वाले होली खेलते हैं। एक दिन बरसाने में नंदगांव के युवक जाते हैं और बरसाने की हुरियारिन उन पर लट्ठ बरसाती हैं और दूसरे दिन बरसाने के युवक नंदगांव पहुंचकर लट्ठमार होली की परंपरा को निभाते हुए ढाल से अपना बचाव करते हैं 


बरसाना : आज भी होता है राधाकृष्ण की मौजूदगी का अहसास | #NayaSaveraNetwork

वैसे तो हमारे देश में राधा देवी के अनेक मंदिर हैं, मगर इन सभी में मथुरा के बरसाना में स्थित राधा रानी का मंदिर सर्वप्रमुख है। यह स्थान श्रीकृष्ण भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। बरसाना की राधा रानी और भगवान कृष्ण को एक-दूसरे का पूरक माना जाता है। भले ही उनकी शादी नहीं हुई थी। मगर वे दुनियाभर में प्यार का प्रतीक कहलाते हैं। साथ ही राधा रानी को श्रीकृष्ण की आत्म कहा जाता है। राधा रानी का जन्म भले ही बरसाना से 50 किमी दूर रावल में हुआ है, लेकिन वे बरसाना में ही पली-बढ़ी है। भगवान श्रीकृष्ण की तरह वे भी अजन्मीं थी। उनके पिता श्री ब्रषभानु और माता कीर्ति थी। पूर्वजन्म में कीर्ति ही कलावती थी। राधा रानी का जन्म जन्माष्टमी के 15 दिन बाद भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था। इसलिए बरसाना के लोगों के लिए यह जगह और दिन बहुत महत्वपूर्ण है। राधाष्टमी पर्व बरसाना वासियों के लिए अति महत्त्वपूर्ण है।

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राधाष्टमी के दिन राधा जी के मंदिर को फूलों और फलों से सजाया जाता है। राधाजी को लड्डुओं और छप्पन प्रकार के व्यंजनों का भोग का भोग लगाया जाता है और उस भोग को सबसे पहले मोर को खिला दिया जाता है। मोर को राधा-कृष्ण का स्वरूप माना जाता है। बाकी प्रसाद को श्रद्धालुओं में बांट दिया जाता है। इस अवसर पर राधा रानी मंदिर में श्रद्धालु बधाई गान गाते है और नाच गाकर राधाअष्टमी का त्योहार मनाते हैं। इस मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों के तल पर वृषभानु महाराज का महल है, जहां वृषभानु महाराज, कीर्तिदा (राधा की मां), श्रीदामा (राधा की सहोदर) और श्री राधिका की मूर्तियां हैं। इस महल के पास ही ब्रह्मा जी का मंदिर भी स्थित है। इसके अलावा, पास में ही अष्टसखी मंदिर है जहां राधा और उनकी प्रमुख सखियों की पूजा की जाती है।

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इस मंदिर की स्थापना श्री कृष्ण के परपोते राजा वज्रनाभ ने किया था। हालांकि, यह मंदिर खंडहर हो चुका है। चैतन्य महाप्रभु के शिष्य नारायण भट्ट ने मंदिर के प्रतीकों को फिर से खोजा, जिसके बाद 1675 में राजा बीर सिंह देव ने मंदिर का निर्माण करवाया। जो मंदिर इस समय हम देखते हैं, उसे राजा टोडरमल की मदद से नारायण भट्ट ने करवाया था।र ाधा रानी मंदिर राजपूत वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण है। इस मंदिर का निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से किया गया है। मंदिर में 200 से अधिक सीढ़ियां हैं। इस मंदिर से पूरे बरसाना को देखा जा सकता है। लाल और पीले पत्थरों से बने इस मंदिर को ‘बरसाने की लाड़ली जी का मंदिर और राधारानी महल भी कहा जाता है।

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राधा जी का ये प्राचीन मंदिर मध्यकालीन है। इसी मंदिर से होली की शुरुवात होती है। बरसाना की होली पूरी दुनिया में मशहूर है. यहां 40 दिनों तक होली मनाई जाती है...यहां की लट्ठमार होली देखने दूर दूर से लोग यहां पहुंचते हैं. लट्ठमार होली में राधारानी के गांव बरसाने की गोपियां और नंदगांव के ग्वाले होली खेलते हैं। एक दिन बरसाने में नंदगांव के युवक जाते हैं और बरसाने की हुरियारिन उन पर लट्ठ बरसाती हैं और दूसरे दिन बरसाने के युवक नंदगांव पहुंचकर लट्ठमार होली की परंपरा को निभाते हुए ढाल से अपना बचाव करते हैं. कहते हे ये परंपरा 5000 साल पहले तब शुरू हुई, जब भगवान श्रीकृष्ण, राधा के गांव बरसाना गए और उन्होंने वहां उनकी उनकी सहेलियों के साथ होली खेली. जवाब में बरसाना की महिलाओं ने भगवान कृष्ण और उनके दोस्तों की लाठियों से पिटाई की। तब से ये परंपरा हर साल लट्ठमार होली के रूप में मनाई जाती है.

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  • पौराणिक मान्यताएं


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार नंद गांव में जब कृष्ण राधा से मिलने बरसाना गांव पहुंचे तो वे राधा और उनकी सहेलियों को चिढ़ाने लगे, जिसके चलते राधा और उनकी सहेलियां कृष्ण और उनके ग्वालों को लाठी से पीटकर अपने आप से दूर करने लगीं. तब से ही इन दोनों गांव में लट्ठमार होली का चलन शुरू हो गया. यह परंपरा आज भी मनाई जाती है. नंद गांव के युवक बरसाना जाते हैं तो खेल के विरुद्ध वहां की महिला लाठियों.से उन्हें भगाती हैं और युवक इस लाठी से बचने का प्रयास करते हैं. अगर वे पकड़े जाते हैं तो उन्हें महिलाओं की वेशभूषा में नृत्य कराया जाता है. इस तरह से लट्ठमार होली मनाई जाती हैं. एक अन्य कथानुसार, नंदगांव से होली खेलने के लिए बरसाना आने का आमंत्रण स्वीकारने की परंपरा इस होली से जुड़ी हुई है, जिसका आज भी पालन किया जा रहा है. यहां सैकडो लड्डू बरसाए जाते हैं. इस लड्डू होली को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं. माना जाता है कि दूर-दूर से आए श्रद्धालु लड्डू का प्रसाद पाकर खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं. लड्डू होली की परंपरा के पीछे एक पौराणिक कथा बताई जाती है. कथा के अनुसार, द्वापर युग में बरसाने से होली खेलने का निमंत्रण लेकर सखियों को नंद गांव भेजा गया था. राधारानी के पिता वृषभानुजी के न्यौते को कान्हा के पिता नंद बाबा ने स्वीकार कर लिया. नंद बाबा ने एक पुरोहित के हाथों एक स्वीकृति का पत्र भी भेजा. बरसाने में वृषभानुजी ने नंदगांव से आए पुरोहित का काफी आदर सत्कार किया और थाल में रखे लड्डू खाने को दिए थे. साथ ही बरसाने की गोपियों ने परोहित को गुलाल भी लगा दिया. फिर क्या था पुरोहित के पास गुलाल तो था नहीं तो उन्होंने थाल में रखे लड्डुओं को ही गोपियों को मारना शुरू कर दिया. तभी से यह लड्डू होली खेले जाने की परंपरा शुरू हई. इसी परंपरा को बरसाने और नंद गांव के लोग आज भी निभा रहे हैं.

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  • आज भी गूंजती है राधारानी के पायल की झंकार

बरसाना में उनकी तमाम बाल लीलाओं के निशान आज भी मौजूद है। ब्रह्मांचल पर्वत के मध्य स्थित गहवरवन जो लताओं व पताओ से घिरा है। जिसे राधारानी ने स्वयं अपने हाथों से लगाया था। इसी वन में राधारानी अपनी सहचरियों के साथ नित्य विहार करती थी। यहां तक कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी कई बार गहवरवन की लताओं पताओ के बीच राधारानी व उनकी सखियों के साथ रास रचाया था। गहवरवन के आसपास तमाम लीला स्थल है। दानगढ़, मोरकुटी, मानगढ़ जहां भगवान श्रीकृष्ण व राधारानी ने अपनी तमाम बाल लीलाएं की थी। आज भी यह बाल लीलाएं बूढ़ी लीला महोत्सव के दौरान जीवंत हो उठती है। गहवरवन में साधना करने वाले साधु संता का कहना है कि रात के अंधेरों में आज भी छोटी सी बच्ची की आवाज सुनी जाती है, लेकिन उन्हें कोई दिखाई नहीं देता।


सुरेश गांधी
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