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#Article : काशी विश्वनाथ, जहां साक्षात बसते हैं महादेव... | #NayaSaveraNetwork


#Article : काशी विश्वनाथ, जहां साक्षात बसते हैं महादेव... | #NayaSaveraNetwork


  • काशी विश्वनाथ, जहां साक्षात बसते हैं देवाधिदेव महादेव...
सुरेश गांधी @  नया सवेरा
    प्राचीन से भी पुराना सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आस्था की नगरी काशी में देवादिदेव महादेव साक्षात वास करते हैं. गंगा किनारे एक-दो नहीं बल्कि चमकते-दमकते सौ से अधिक घाटों की कतारबद्ध श्रृंखलाओं के बीच बजते घंट-घडियालों व शंखों की गूंज। कभी ना बुझने वाली मणकर्णिका घाट की आगी। स्वर्णिम किरणों में नहाएं घाटों पर अविरल मंत्रोंचार। कल-कल बहती पतित पावनि मां गंगा। ये विहगंम व सुंदर दृश्य खुद-ब-खुद कहती है यहां एक संस्कृति है - तैतीस करोड़ देवी-देवताओं की स्थली है। इस महात्य के पीछे बड़ा रहस्य यह है कि पूरी काशी देवादिदेव महादेव के त्रिशूल पर टिकी है। धर्मग्रन्थों और पुराणों के अलावा सप्तपुरियों में से एक काशी को मोक्ष की नगरी भी कहा गया है, जो अनंतकाल से बाबा विश्वनाथ के भक्तों के जयकारों से गूंजती आयी है। काशी शिव भक्तों की वो मंजिल है जो सदियों से यहां मोक्ष की तलाश में आते रहे हैं. कहते है काशी के कण-कण में चमत्कार की ढेरों कहानियां समेटे और बारह ज्योर्तिलिंगो में एक बाबा विश्वनाथ धाम में आकर भक्तों की हर मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं औऱ जीवन धन्य हो जाता है. यहां गंगा स्नान से सभी पाप धुल जाते हैं. ज्योतिषाचार्यों का दावा है अगर भक्तों के जीवन में ग्रह दशा के कारण परेशानी आ रही है, ग्रहों के चाल ने जीना दूभर कर दिया है तो सच्चे मन से बाबा का दर्शन कर रूद्राभिषेक किया जाएं तो ग्रह बांधा से मुक्ति तो मिलेगी ही उसके लिए मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं 
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    बारह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। यह स्थान शिव और पार्वती का आदि स्थान है। इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद के साथ प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में भी किया गया है। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहां श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदुसरोवर बन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए। काशी का इतना माहात्म्य है कि सबसे बड़े पुराण स्कन्दमहापुराण में काशीखण्ड के नाम से एक विस्तृत पृथक विभाग ही है। इस पुरी के बारह प्रसिद्ध नाम- काशी, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनन्दकानन, महाश्मशान, रुद्रावास, काशिका, तपरूस्थली, मुक्तिभूमि, शिवपुरी, त्रिपुरारिराजनगरीऔर विश्वनाथनगरी हैं।

    भूमिष्ठापिन यात्र भूस्त्रिदिवतोऽप्युच्चौरधरूस्थापिया

    या बद्धाभुविमुक्तिदास्युरमृतंयस्यांमृताजन्तवरू।

    या नित्यंत्रिजगत्पवित्रतटिनीतीरेसुरैरूसेव्यते।

    सा काशी त्रिपुरारिराजनगरीपायादपायाज्जगत।।

    जो भूतल पर होने पर भी पृथ्वी से संबद्ध नहीं है, जो जगत की सीमाओं से बंधी होने पर भी सभी का बन्धन काटने वाली (मोक्षदायिनी) है, जो महात्रिलोक पावनी गंगा के तट पर सुशोभित तथा देवताओं से सुसेवित है, त्रिपुरारि भगवान विश्वनाथ की राजधानी वह काशी संपूर्ण जगत् की रक्षा करे। सनातन धर्म के ग्रंथों के अध्ययन से काशी का लोकोत्तर स्वरूप विदित होता है। 
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    कहा जाता है कि यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अतः प्रलय होने पर भी इसका नाश नहीं होता है। काशी नाम का अर्थ भी यही है-जहां ब्रह्म प्रकाशित हो। भगवान शिव काशी को कभी नहीं छोडते। जहां देह त्यागने मात्र से प्राणी मुक्त हो जाय, वह अविमुक्त क्षेत्र यही है। सनातन धर्मावलंबियों का दृढ विश्वास है कि काशी में देहावसान के समय भगवान शंकर मरणोन्मुख प्राणी को तारकमन्त्र सुनाते हैं। इससे जीव को तत्वज्ञान हो जाता है और उसके सामने अपना ब्रह्मस्वरूप प्रकाशित हो जाता है। शास्त्रों का उद्घोष है-

    यत्र कुत्रापिवाकाश्यांमरणेसमहेश्वरः।

    जन्तोर्दक्षिणकर्णेतुमत्तारंसमुपादिशेत्।।

    काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान विश्वेश्वर (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं। तारकमन्त्र सुन कर जीव भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह मान्यता है कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं। इस संदर्भ में काशीखण्ड में लिखा भी है-

    अन्यानिमुक्तिक्षेत्राणिकाशीप्राप्तिकराणिच।

    काशींप्राप्य विमुच्येतनान्यथातीर्थकोटिभिः।।

    ऐसा इसलिए है कि पांच कोस की संपूर्ण काशी ही विश्व के अधिपति भगवान विश्वनाथ का आधिभौतिक स्वरूप है। काशीखण्ड पूरी काशी को ही ज्योतिर्लिंग का स्वरूप मानता है। काशी में प्राण त्यागने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता। पर्व उत्सवों का रसिया शहर बनारस अपने मन मिजाज और अंदाज के लिए जाना जाता है। इसे केयरलेस समझने की भूल न करिएगा, वास्तव में यह केयरफ्री है। मन में जो आया, पीया -खाया और परिधान के स्तर पर भी वही जो खुद को भाया। 
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    कहते है कि जब भगवान शंकर ने क्रुद्ध होकर ब्रह्माजी का 5वां सिर काट दिया, तो वह उनके करतल से चिपक गया। बारह वर्षों तक अनेक तीर्थों में भ्रमण करने पर भी वह सिर उनसे अलग नहीं हुआ। किंतु जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और वह कपाल भी अलग हो गया। जहां यह घटना घटी, वह स्थान कपालमोचन-तीर्थ कहलाया। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास-स्थान बन गया।

    • देवाधिदेव महादेव है बाबा विश्वनाथ

    बाबा विश्वनाथ को देवाधिदेव महादेव इसलिए कहा गया है कि वे देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, किन्नर, गंधर्व पशु-पक्षी एवं समस्त वनस्पति जगत के भी स्वामी हैं। शिव की अराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होने लगता है। इसीलिए, स्तुति गान कहता है- मैं आपकी अनंत शक्ति को भला क्या समझ सकता हूं। अतः में हे शिव, आप जिस रूप में भी हों उसी रूप को मेरा आपको प्रणाम। शिव शब्द का अर्थ है ‘कल्याण करने वाला’। शिव ही शंकर हैं। शिव के ‘श‘ का अर्थ है कल्याण और ‘क‘ का अर्थ है करने वाला। शिव, अद्वैत, कल्याण- ये सारे शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं। शिव ही ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा ही शिव हैं। 

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    ब्रह्मा जगत के जन्मादि के कारण हैं। मान्यता यह भी है कि जिस प्रकार भगवान शिव के त्रिशूल, डमरू आदि सभी वस्तुओं तथा शिव का संबंध नौ ग्रहों से जोडा गया है, उसी प्रकार भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का संबंध बारह चन्द्र राशियों से जोडा गया है, जो इस प्रकार है-मेष राशि का संबंध श्रीसोमनाथ ज्योतिर्लिंग, वृष राशि का श्रीशैल ज्योतिर्लिंग, मिथुन राशि का श्रीमहाकाल ज्योतिर्लिंग, कर्क राशि का श्रीऊँकारेश्वर अथवा अमलेश्वर ज्योतिर्लिंग, सिंह राशि का श्रीवैद्यनाथधाम ज्योतिर्लिंग, कन्या राशि का श्रीभीमशंकर ज्योतिर्लिंग, तुला राशि का श्रीरामेश्वर ज्योतिर्लिंग, वृश्चिक राशि का श्रीनागेश्वर ज्योतिर्लिंग, धनु राशि का श्रीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग, मकर राशि का श्रीत्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग, कुम्भ राशि का श्रीकेदारनाथधाम से मीन राशि का संबंध श्रीघुश्मेश्वर अथवा श्रीगिरीश्नेश्वर ज्योतिर्लिंग से है। बाबा विश्वनाथ धाम में गर्भगृह व कॉरीडोर में लगी देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों का दर्शन कर लोग जहां अपने आप को कृतार्थ करते हैं। 

    पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक धरती के खत्म होने के बाद भी बचा रहेगा यह मंदिर, क्योंकि स्वयं महादेव करते हैं इसकी रक्षा! पुराणों के मुताबिक प्रलय आने पर भगवान भोलेनाथ इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल शुरू होने पर इसे त्रिशूल से नीचे उतार देते हैं. यहां भगवान शिव माता पार्वती के साथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हैं. इसके अलावा धर्म ग्रंथों में यह भी उल्लेख है कि काशी में प्राण त्याग वाले व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग को लेकर पुराणों में कहा गया है कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह होने के बाद भी माता पार्वती अपने पिता के घर पर ही रहती हैं. 

    एक बार उन्होंने अपने पति शिव जी से कहा कि वे उन्हें अपने साथ ले जाएं. इसके बाद भगवान शिव माता पार्वती को लेकर इसी पवित्र नगरी काशी में लाए थे और यहां आकर वो विश्वनाथ-ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए. इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही व्यक्ति के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. इस मंदिर का महत्व जितना बड़ा है, वैसी ही इसकी भव्यता भी कमाल की है. इस मंदिर का शिखर 51 फीट ऊंचा है और  इस पर इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1777 में पांच पंडप बनवाए थे. बाद में 1853 में पंजाब के राजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखरों को 22 टन सोने से स्वर्णमंडित करवाया था. खास बात यह है

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