बलात्कार बलात्कारी और हमारे नियम | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
जबसे भारत में बलात्कार के विरुद्ध कठोर नियम संसद द्वारा सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाये गये,तब से देश में बलात्कार की घटनायें बढ़ गई हैं|जैसे बाढ़ सी आ गई है|हर दिन अखबार में टेलीविजन पर व सोशल मिडिया पर दस बीस खबरें तो देखने सुनने व पढ़ने को प्रमुखता से मिल ही जाती हैं|ऐसा लगता है जैसे हर दूसरा व्यक्ति बलात्कारी हो और हर औरत इसका शिकार हो रही हो|कभी कभी तो टेलीविजन न्यूज चैनल वाले तो प्रत्यक्ष दिखाते हैं|और क्रिकेट की कमेंट्री की तरह हर पोजीशन की कमेंट्री करते हुए भी दिखते हैं|वहाँ दिमाग झन्ना जाता है|कि भारत में प्रत्यक्ष बलात्कार टेलीविजन पर दिखाया जा रहा है|प्रशासन देख रहा है|न्यूज चैनल दिखा रहा है|पर कोई बचाने का या रोकने का प्रयास करता नहीं दिखता है|क्यों? यह सवाल है मेरा सभी से|
कई बार सुनने में आता है कि शादी का झाँसा देकर बलात्कार हुआ|अब समझ में ये नहीं आ रहा है कि जब अपनी मर्जी से सबकुछ हुआ तो बलात्कार कैसे हुआ|नौकरी का झांँसा देकर बलात्कार हुआ|यहाँ भी वही बात हुई|पैसा देकर बलात्कार हुआ|अब कोई बताये कि लालच में पड़कर जब कोई महिला किसी पुरुष के सामने बिछ गई खुशी खुशी तो बलात्कार कैसे हुआ|जब तक मजे लेना था लीं|बात बिगड़ गई तो बलात्कार कैसे हुआ|आज कल कुछ महिलायें बहुत शातिर हो गई हैं|वो अपनी सेक्सुवल अदाओं से पुरुषों को अपने रूप झाल में फॕसाती हैं|और उसका आर्थिक शारीरिक दोहन करती हैं|जब वह व्यक्ति आर्थिक रूप से असमर्थ हो जाता है तो कानून का सहारा लेकर उसे ब्लैकमेल करती हैं|जब वह व्यक्ति किसी तरह से भी इनकी बात नहीं मानता तो उस पर बलॎत्कार का मुकदमा करके जेल भिजवा देती हैं|और हमारा शासन तंत्र एक मजबूर व्यक्ति को साइको बलात्कारी बनाकर उसे समाज के सामने प्रस्तुत करता है|जैसे वह बहुत बड़ा बलात्कारी हो|जबकी वह जो कुछ भी किया महिला की सहमति से किया|यदि बलात्कार करता तो महिला को कहीं घसीट कर ले जाता|महिला को चोटें आती तो समझ में आता पर ऐसा कुछ होता नहीं|और शासन सहमति से किये गये सम्भोग को बलात्कार मान लेता है|यह कहाँ तक उचित है?
कभी कभी देखने सुनने में यह आता है कि कोई महिला किसी पुरुष से कर्ज लेती है|जब चुकता नहीं कर पाती तो पुरुष पर झूठे छेड़ छाड़ का मुकदमा करके पुरुष को फॕसा देती है|और उसका जीवन बरवाद कर देती है|कानून का दुरुपयोग करके अपना उल्लू सीधा करती है़ं|अभी हाल ही की एक घटना यूपी से आई है|जो मेरे भी संज्ञान में है|एक शादी शुदा महिला गाँव के ही एक युवक को अपने रूप जाल में फँसाकर अपना रखैल बना ली और उसका आर्थिक व शारीरिक दोनो शोषण की|खूब सेवा ली|जब उस युवक की शादी की चर्चा चली तो उसने उस पर बलात्कार का मुकदमा कर दिया|युवक जब सुना तो वह भय बस गाँव से भाग लिया|विगत दिनो़ उसके पिता का निधन हुआ|वह युवक गाँव आया तो उक्त महिला ने पुलिस को सूचित कर उस युवक को गिरफ्तार करवा दी|जबकी उसके पिता की चिता की आग अभी शांत भी नहीं हुई थी|पुलिस वाले अति असंवेदनशीलता का प्रदर्शन कर दविश देकर उस युवक को गिरफ्तार करके ले गई जो किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता|यदि उक्त महिला के साथ बलात्कार हुआ था तो क्या पुलिस ने छान बीन की|नहीं की| बिना जाँच के युवक को बलात्कारी बना दी,जबकी उक्त महिला का चरित्र नहीं जाँचा गया|जब वह अपने पति के रहते दूसरे को रखैल बनाकर रखती है तो उसका चरित्र भी जाँचना चाहिए था पुलिस को|लेकिन पुलिस वाले ए जहमत क्यों उठायें|उनको तो एक केस बनाना था|घर बैठे मिल गया|और एक गरीब युवक को बलि का बकरा बना दिए|
इसी तरह की और कहानियाँ भी देखने सुनने को मिल रही है|इसीलिए आज अदालतें बलात्कार की केसों से अटी पड़ी हैं|जब सहमति से सम्भोग हुआ तो बलात्कार की संज्ञा देना कहाँ तक उचित है|लालच बस यदि सहमति बनी तो भी बलात्कार कैसे हुआ|हाँ यदि सरकारी नियम के अनुसार 18 वर्ष से कम युवती से लालच देकर सहवास किया जाता है तो वह गुनाह है|लेकिन बलात्कार कह देना वह भी ठीक नहीं है|हाँ सहवास करने वाले युवक या पुरुष को दंडित अवश्य करना चाहिए|यह गुनाह है|बलात्कार करने वाला समाज का कोढ़ है उसे मिटाना चाहिए|मगर कभी कभी यहाँ भी यदि बलात्कारी रसूखदार है तो पुलिस वाले लीपापोती करने लगते है़|और पिड़िता पर दबाव बनाकर समझौता करवाने की कोशिस कर ते हैं|यह विचार भी ठीक नहीं है|न ही बलात्कारी को किसी भी तरह का समर्थन मिलना चाहिए|लेकिन बलात्कार और सम्भोग में अंतर तो करना ही चाहिए|ऐसे ही किसी को बलात्कारी नहीं बना देना चाहिए|
आज जितनी केस बलात्कार की अदालत में है यदि बारीकी से छान बीन की जाय तो आधी से अधिक खारिज हो जायेंगी|क्योंकि आधी से अधिक फर्जी ईर्ष्या बस बदले की भावना से हैं|और सम्भोग हैं|नियम ये होना चाहिए कि सम्भोग को बलात्कार की संज्ञा से हटाकर ऐसे केस को कुछ अलग करके देखा जाय|और दोनो अनैतिक सम्भोगियों को दंडित करने का नियम बनना चाहिए|दोनो की गलतियों की अधिकता के हिसाब से दंड विधान बनना चाहिए|न की किसी गरीब का जीवन बरवाद कर देना चाहिए|किसी मजबूर को सताना चाहिए|यदि इस ढंग से प्रशॎसन काम करना शुरू कर दे|राम कसम आधे से अधिक मुकदमें हों ही नहीं|और प्रशासन भी इन झंझटों से मुक्त हो दूसरी तरफ ध्यान लगा सके|लेकिन यहाँ देखने के लिए यह मिलता है जो कानून सुरक्षा के लिए बनता है उसका सद्उपयोग कम दुरुपयोग अधिक होता है|असली अपराधी ऐश करता है और वेगुनाह शूली पर चढ़ जाता है|
हमारा पुलिस महकमा उसमें घी डालने का काम करता है|अपनी पोजीशन बनाने व बचाने के लिए कुछ भी और किसी को भी बिना जाँच पड़ताल के दोषी बना देता है|कभी कभी तो अपने खास लोगों को बचाने के लिए बेगुनाह को उठाकर जेल में डाल देता है|और प्रेस कान्फ्रेंस करके अपनी पीठ थपथपाता है|असली अपराधी छुट्टे साँड़ जैसा घूमता है अगले शिकार के लिए|बेगुनाह मजबूर लाचार जेल में सड़ता है|क्योंकि उसको बचाने के लिए कोई आगे नहीं आता|उसके पैसा नहीं होता दमदार वकील से अपनी पैरवी करवाने के लिए|जो कि दमदारी से उसका पक्ष रख सके|और उसे अपराध मुक्त करा सके|पुलिस वाले कोई भी चोरी की या बलात्कार आदि के केस में पुलिस स्टेशन से ही सबकुछ हलाभला कर लेते हैं|कभी भी सतह में या मैदान में आकर सही तरीके से जाँच पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाते|हाँ वहीं से बैठे बैठे सब कमाल कर लेते हैं|वो यह नहीं कर पाते कि पहले इस केस की जाँच पड़ताल करें|सही गलत का पता लगायें छानबीन करें|तब किसी पर गिरफ्तारी जैसी कार्यवाई करें|कभी कभी गलत तरीके से किसी को यदि फॕसाकर जेल भेजा जाता है तो|वह बाहर अाने के बाद अपराधी न होते हुए अपराधी बन जाता है|उसके अंदर से जेल जाने वाला भय निकल जाता है|सबसे बड़ा बदनामी वाला भय निकल जाता है|और वह दुर्दांत अपराधी बन जाता है|पुलिस और शासन की गलत नीतियों के चक्कर में एक अच्छा भला आदमी समाज का कोढ़ बन जाता है,और समाज को तब वह सताता है|मैं किसी भी तरह के अपराध का समर्थन नहीं करता|मगर दंड देने से पहले जिसे अपराधी घोषित किया जा रहा है,उसकी जाँच पड़ताल बहुत आवश्यक है|यह ध्यान देना बहुत जरूरी है कि जिसे हम अपराधी बना रहे हैं|वह अपराध किया है कि नहीं|कहीं बेवजह दंडित करके उसे अपराध करने के लिए प्रेरित तो नहीं कर रहे|क्योंकि एकबार जब शरीफ व्यक्ति बिना वजह जेल जाता है|और जेल में कुछ दिन रहता है|वहाँ की गतिविधियों से परिचित होता है|तो सुधरता नहीं है|अपराधी न हो करके गलत तरीके से उसके साथ अन्याय हुआ|इसलिए वह बदलने की जगह बदले की भावना लिए जेल से बाहर आता है और बदला लेता है,समाज से सरकार से|सबकी नाक में दम कर देता है|इसलिए किसी को किसी के कहने भर से अपराधी न मान लिया जाय|इमानदारी से जाँच पड़ताल करके किसी पर भी उचित कार्मवाई की जाय|सबका भला होगा|और अपराध कम होगा|
पं.जमदग्निपुरी


