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पीएम मोदी ने किया सी-ब्रिज ‘अटल सेतु’ का उद्घाटन | #NayaSaveraNetwork

पीएम मोदी ने किया सी-ब्रिज ‘अटल सेतु’ का उद्घाटन | #NayaSaveraNetwork
  • समुद्र की गहराई में कैसे बना देश का पहला सी-ब्रिज ‘अटल सेतु’?

नया सवेरा नेटवर्क

मुंबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को मुंबई से नवी मुंबई को जोड़ने वाले देश के सबसे लंबे समुद्र पुल अटल सेतु का उद्घाटन कर दिया है. इस पुल के चालु होने के बादमुंबई से नवी मुंबई की दूरी को 20 मिनट में पूरा किया जा सकेगा, जिसमें अब तक 2 घंटे लग जाते थे. इतना ही नहीं, इस पुल को तकनीक से भी जोड़ गया है. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. अटल सेतु की खासियत यह भी है कि 22 किलोमीटर लम्बा यह पुल 16 किलोमीटर तक समुद्र में है और मात्र 5.5 किलोमीटर जमीन में. ऐसे में सवाल है कि आखिर समुद्र की इतनी गहराई में कैसे बना लिया जाता है पुल.

  • समुद्र में कैसे बनाया जाता है पुल, 5 पॉइंट में समझें


कैसे होती है शुरुआत

पुल को बनाने से पहले कई बातों पर गौर किया जाता है. जैसे- जिस जगह पुल बनना है कि वहां की गहराई कितनी है. मिट्टी की क्वालिटी कैसी है. ब्रिज बनाने पर वहां कितना भार पड़ेगा और उस ब्रिज पर वाहनों का कितना भार पड़ेगा. यह सारें पॉइंट्स तय होने के बाद ब्रिज की प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की जाती है और इसका निर्माण शुरू किया जाता है. जिस जगह पर पुल बनाया जाना है, वहां की गहराई में मौजूद चट्टान की भी जांच की जाती है. इससे यह तय हो पाता है कि पुल कितना मजबूती से खड़ा रह पाएगा.


गिलास में स्ट्रॉ की तरह तैयारी

आसान भाषा में समझें तो पानी में पिलर को खड़े करने की प्रॉसेस बिल्कुल वैसी ही है जब पानी भरे किसी गिलास में स्टॉ को डालना. वो पानी को हटाते हुए अपनी जगह बनाती है और बाद में स्टॉ में मौजूद पानी को हटाकर में कंक्रीट और दूसरी चीजों से मजबूत बनाते हुए ब्रिज के लिए सपोर्ट तैयार किया जाता है.


ऐसे पड़ती है नींव

पानी में पुल की नींव की रखने के लिए कोफर डैम का इस्तेमाल किया जाता है. यह ड्रम के रूप में दिखते हैं. जिन्हें स्टील की बड़ी और भारी प्लेट्स के जरिए बनाया जाता है. इन्हें क्रेन के जरिए गहराई तक पहुंचाया जाता है. इसे उस गहराई तक ले जाया जाता जब तक सतह की चट्टान में मजबूती से न बैठ जाए. इसका आकार गोल और वर्गाकार दोनों तरह का हो सकता है. यह निर्भर करता है पानी का बहाव किस तरह का है.


हटाया जाता है पानी

कोफरडैम को पानी में ले जाया जाता है. इसकी मदद से आसपास का पानी हट जाता है. जैसे-जैसे यह पानी में पहुंचता है, पानी हटता जाता है. खास बात है कि जब पानी में गहराई ज्यादा होती है तो सिर्फ कोफरडैम से काम नहीं चलता. यहां पर पॉइंट बनाकर का शुरू होता है. आसपास की मिट्टी को हटाया जाता है. सफाई होने के बाद इसमें कंक्रीट, पाइप और दूसरी चीजों को इस्तेमाल करके इसकी संरचना को तैयार किया जाता है. हालांकि यह प्रक्रिया लम्बी चलती है.


पिलर्स के बाद सेट होते हैं ब्लॉक्स

पानी की सतह से जोड़ते हुए मेन साइट पर मजबूती के साथ पिलर्स खड़े किए जाते हैं. इसी के साथ दूसरे हिस्से में ब्लॉक्स को बनाने का काम साथ ही साथ चलता रहता है. नींव मजबूत होने के बाद इसकी डिजाइन पर काम शुरू किया जाता है. इसमें पिन, रोलर, रॉकर, स्लाइडिंग, इलास्टोमेरिक का इस्तेमाल किया जाता है.


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