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असुर तब भी थे असुर अब भी हैं | #NayaSaveraNetwork

पं.जमदग्निपुरी

नया सवेरा नेटवर्क

 जब से सृष्टि है तभी से धरा पर असुर भी हैं|जो हर धार्मिक आयोजन में विघ्न डालते हैं|सनातन के विरुध्द आचरण करते हैं|सनातन यदि मानवता की शिक्षा देता है|पूजन वंदन की व सही ढंग से रहने खाने जीने की शिक्षा देता है|हवन यज्ञ करके वातावरण को शुद्ध रखने की शिक्षा देता है|ईष्ट कार्य में सात्विक भाव से लगने की शिक्षा देता है तो अासुरी शक्तियाँ ठीक इसके विपरीत कार्य करती है|ईष्ट का विरोध,अधार्मिक कार्य, शराब कबाब शबाब में आशक्ति,मार काट,अपहरण,डकैती,बकैती,छिनैती,बलात्कार,परनारी गमन,हवन यज्ञ में खलल,मांस भक्षण आदि  आसुरी प्रवृत्ति के लोग करते और करवाते हैं|मिथ्या भाषण मिथ्या प्रचार लोगों को छल बल धन से अपने कुकृत्यों की तरफ मोड़ना ही आसुरी शक्तियों का महत्वपूर्ण कार्य है| 

मनुष्य की प्रकृति ही है वह सदैव अहितकर की तरफ विशेष तौर से आकर्षित होता है|सही चीजें जल्दी नहीं समझता न देखता है|सही कार्य करने के लिए मानव को बहुत बार बताना समझाना पड़ता है|वहीं गलत कार्य के लिए किसी को कुछ नहीं कहना समझाना पड़ता है|गलत कार्य मानव बिना कहे बिना बताये स्वतः ही करता है|क्योंकि मानव जन्म से ही विकृत मांसिकता का होता है|उसे जिस तरह बनाना चाहोगे वह वैसा ही बनेगा|संत  बड़ी मेहनत से बनता है|और बड़ी मशक्कत से बनाना पड़ता है|असुर स्वतः ही बनता है|क्योंकि मनुष्य त्रिगुणी होता है|रजो तमो सतो यही तीन गुण मनुष्य में होते हैं|जिसमें तमो और रजो हावी रहता है|सतोगुण बड़ी कठिनाई से मनुष्य में ठहरता है|तमोगुण विशेष रूप से सदैव विद्यमान रहता है|मनुष्य तमोगुण के प्रभाव से ही अनैतिक और मानवता विरोधी,धर्म विरोधी कार्य में संलिप्त हो जाता है|आसुरी प्रवृत्ति उस पर हावी हो जाती है|इसलिए वह असुर बन जाता है|

      इश्वर विरोधी तब भी थे और अब भी हैं|ईश्वर विरोधी वही होता है जो असुर हो|जो ईश्वर विरोधी नहीं होता है,जो सतमार्ग पर चलता है|धार्मिक कार्य में अपने को लगाये रहता है|किसी का अनभल नहीं चाहता,विश्व कल्याण की भावना लिए जीता है|वह संत होता है|वह सुर कहा जाता है|लेकिन आजकल शंकराचार्य की पदवी धारण किए हुए लोग भी अहंकारी और विघटनकारी बन असुरत्व में लिप्त हैं|देव तुल्य होकर भी आचरणहीन हैं|जहाँ भी आते जाते हैं रजोगुड़ी की तरह जाते हैं|ऐसा लगता ही नहीं कि कोई संत आ रहा है|ऐसा लगता है जैसे कोई राजा आ रहा है|आज शंकराचार्य अपने को इंद्र मानकर जी रहे हैं|अहं भरा हुआ है|ऋषित्व तो बाहर से हैं भीतर असुर बैठा है|ए जितने भी बड़े बड़े मठाधीश हैं|धर्मध्वज वाहक हैं|सभी रजोगुणी हैं|सतोगुण से काफी दूर हैं|इनके अंदर माया क्रोध दोनो गहराई तक पैठे हैं|ए अपने आगे किसी की न सुनते हैं न किसी को मानते हैं|आज के जितने मठाधीश हैं ए सभी स्वसेवी हैं|इन्हें न धर्म से कुछ लेना देना है न देश से न जनहित से|आज के जितने धर्माचार्य हैं मठाधीश हैं|सभी हरदम मजे कर रहे हैं स्वर्गानंदी बने हुए हैं|इन्हें खुलकर धर्म के लिए लड़ते कभी न देखा न सुना|राम मंदिर का ही आंदोलन इतने दिनों से चल रहा था एक भी शंकराचार्य कभी भी खुलकर सामने नहीं आया|हाँ साधु संतों ने काफी बलिदान दिया ,और लड़ाईयाँ जरूर लड़ी हैं|जितने भी शंकराचार्य नियुक्त हुए हैं सबके सब सरकार के रहमोकरम पर हुए हैं|जो भी शंकराचार्य सरकार के विरुद्ध गया उसकी दुर्गति जयेन्द्र सरस्वती जी के जैसी हुई| आज जितने भी शंकराचार्य हैं सभी कांग्रेस के शासन काल वाले हैं|तो जाहिर है कि चमचई से ही बने होंगे|इसी लिए उपकार को उतारने के लिए राम विरोधी बन रहे हैं|इसीलिए आज शंकाराचार्यों ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के विरुद्ध मुखर होके बोला है|उससे यही साबित होता है कि 

मुनि न होइ यह निशिचर घोरा|

मानहु सत्य वचन यह मोरा||

यह चौपाई इन शंकराचार्यों पर आज बहुत फिट बैठ रही है|ये लोग मुनि के वेश में कालनेमि असुर हैं | जो प्रभु कार्य में विघ्न डाल रहे हैं|

आज आसुरी शक्तियों द्वारा नष्ट किये गये श्री रामजी के  मंदिर का पुनर्निमाण तीब्र गति से हो रहा है तो आसुरी शक्तियाँ भी उसी गति से सक्रिय हो गई हैं|और अनाप शनाप बक रही हैं|और अपनी छाप मानव मन पर अंकित करने के लिए छटपटा रही हैं|पहले किसी भी हवन यज्ञ को आसुरी शक्तियाँ हवन कुण्ड में मांस आदि डालकर,ऋषि मुनियों की हत्या कर पूर्ण नहीं होने देती थी|आज शब्द रूपी हांड मांस डाले जा रहे हैं|विगत 500 सौ वर्षों से आसुरी शक्तियों के प्रभाव से सनातन के आराध्य प्रभु श्रीराम जी अपने ही जन्मस्थली में विस्थापित पड़े थे|क्योंकि आसुरी शक्तियाँ प्रबल थी और दैवीय शक्तियाँ क्षीण पड़ी थी|अब जाके दैवीय शक्तियाँ मजबूत हुई तो प्रभु श्रीराम जी अपने स्थान पर विराजमान होने जा रहे हैं|तो आसुरी शक्तियाँ बिलबिला रही हैं|कुछ कालनेमि की तरह कुछ कंस की तरह|खरदूषण दुर्योधन दुशासन आदि भी छटपटा रहे हैं|रावण की तो बात ही छोड़िए|इतने दिनों तक सभी शंकराचार्य धृतराष्ट्र की तरह थे|आज जैसे ही प्राण प्रतिष्ठा की शुभ घड़ी आई तो ये भी सक्रिय हो गये|विभीषण तो राम राम धुन में मस्त अयोध्या पहुँच गया|कालनेमि अपने असली रूप में आ गये|और असुर रावण के कार्य में लग गये|2014 के पहले जितने कालनेमि छुपे हुए थे|सभी धीरे धीरे बाहर आ रहे हैं|क्योंकि रामदूत के पैरों के दवाब को सह नहीं पा रहे|और अपने असली रूप में छटपटाते हुए आ रहे हैं|रामकाज में विघ्न उत्पन्न कर रहे हैं|लेकिन जनमानस राम भक्ति में लीन सिर्फ रामदूतों की ही सुन रहा है|

जिस तरह से आज अधार्मिक आसुरी शक्तियाँ श्रीराम जी के मंदिर से और उसकी प्राण प्रतिष्ठा से अपने को दूर रख रही हैं|तरह तरह से विरोध कर रही हैं|उससे यह बात स्पष्ट हो रही है कि -जैसे ज्वर के जोर से,भूख विदा होइ जाय|

तुलसी पूरब पाप ते,हरि चर्चा न सोहाय

तब भी ऐसी ही शक्तियाँ थी जो दैव कार्य में विघ्न पड़ती थी|तब के असुरों का जो विकृत चित्र दिखाया बताया जाता है वह बाहरी नहीं आंतरिक था|जैसे आज के हैं वैसे ही रंग रूप काया के तब भी थे|ऐसा नहीं है कि पूर्व में ईष्ट काम के विरोधी असुर ही होते थे|यदा कदा सुर भी ईष्ट विरोधी हो जाते थे|रामचरित मानस में कई जगह इसका भी उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है|जब प्रभु श्रीरामजी का राज्याभिषेक होने वाला था|जैसे ही देवताओं को पता चला वे भी आसुरी आचरण अपनाये|गोस्वामी जी कहते हैं|कि-

उँच निवास नीच करतूती|

देखि न सकहिं पराइ विभूती||

सकल कहहिं कब होहइं काली|

विघ्न मनावहिं देव कुचाली||

   लेकिन देव लोग जनहित के लिए विघ्न मना रहे थे डाल नहीं रहे थे|असुर विघ्न मनाते नहीं डालते हैं स्वहित में|अपने सुख के लिए|जैसे कि आज श्रीराम मंदिर की भव्यता देखकर विघ्न डाला जा रहा है|राम भक्त हर्षित उल्लसषित अति उत्साहित  उस दिन का भरत जी के जैसे विह्वलता से इंतजार कर रहे हैं कि कब 22 जनवरी का वो दिन आये और हम सभी अपने ईष्ट को अपने स्थान पर विराजित होते देख अपने जीवन को धन्य बनायें|वहीं आज की आसुरी शक्तियाँ हर तरह से विघ्न डालकर जन मन को भड़काने में जी जान से जुटी हैं|इसलिए कहना पड़ रहा है असुर तब भी थे आज भी हैं|


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