'एक सांस सबके हिस्से से' | लेखिका- पायल लक्ष्मी सोनी | #NayaSaveraNetwork


नया सवेरा नेटवर्क

सुश्री पायल लक्ष्मी सोनी जी को उनकी विचारोत्तेजक कृति ‘एक साँस सब के हिस्से की’ के लोकार्पण पर हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं। लगभग ७० साल पूर्व पद्मसिंह कमलेश को दिए गए अपने एक साक्षात्कार में तत्कालीन छतरपुर राज्य के माननीय मुख्यन्यायाधीश रहे प्रसिद्द निबंधकार गुलाब रे जी हिंदी में विचारोत्तेजक सृजन की आवश्यकता पर जोर दिए थे। 

ख़ुशी से भेरे इस धुपछाहीं इस कार्यक्रम में कृति की दर्द भरी रचनाओं को पढ़कर मुझे वरिष्ठ कवि श्री अजय शेखर जी की दो पंक्तियाँ याद आ गईं-जश्न आज गीतों के घर है/ नाच रहे हैं जख्म हरे।

मैं जनता हूँ और लिखा भी हूँ¬-रात-रात भर अश्क़ पिया हूँ/ तब जाकर इक गीत जिया हूँ... साथ ही मुख्य वक्ता और विशिष्ठ अतिथियों के उद्बोधन के साथ सोनी जी की रचनाओं का आप सब के मानस पटल पर जो प्रभाव देख रहा हूँ, उससे मुझे सैफुद्दीन सैफ़ साहब का एक शे’र याद आ गया-

जो सुनाई अंजुमन में, शबे-गम की आप बीती 

कई  रो के  मुस्कराए,  कई  मुस्करा  के  रोए।

अथर्ववेद का मंत्र-द्रष्टा ऋषि कहता है- “पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति”। भावार्थ यह है कि उस परमेश्वर की काव्य –कृति, इस सृष्टि को देखो, जो नित्य नव्य और सदाजीवी है। वस्तुतः सृष्टि की रचना करने वाला स्वयं भी तो एक कवि ही है। यह संसार उसकी काव्य-कृति है। 

इसलिए इस संसार को समझने के लिए भी एक कवि दृष्टि की ही आवश्यकता होती है, परन्तु इसे समझने की चेष्टा अपने आपमें तलवार की धार पर चलने जैसी ही है, जिसे कठोपनिषद् का यह मन्त्र- “क्षुरस्य धारा निषिता दुरत्या दुर्गं पथं तत् कवयोः वदन्ति”, स्पष्ट करता है, तभी तो ईशोपनिषद् कहता है- “कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू”।

अब बात आती है आखिर काव्य है क्या? अमरकोश में गीत के छह लक्षण बताए गए हैं-

सुस्वरं सरसं चैव सरागं मधुराक्षरम्। सालंकारं प्रमाणं च षडविधं गीत लक्षणम्।। 

‘नवगीत दशक’ की भूमिका में डॉ शम्भुनाथ सिंह लिखते हैं-

“एक युग में किसी विधा में जो नवीनता और मौलिकता दिखाई पड़ती है, वह अगले परिवर्तित युग में घिसी-पिटी और बासी प्रतीत होने लगती है। तब नए कवि अपने युग की आवश्यकता और जीवन दृष्टि के अनुरूप तथा अंतर्दृष्टिमूलक कल्पना के सहारे उस विधा में नवीन सौन्दर्य और नई चमक उत्पन्न करते हुए नवीन तथा आत्मानुभूत सत्य की अभिव्यक्ति करने लगते हैं।“

डॉ शम्भुनाथ सिंह जी तो युग की बात करते है, परन्तु ग़ालिब साहब को तो इसकी अनुभूति अपने जीवन काल में अपनी रचनाओं की विधा ग़ज़ल की अनुभूति के अनुरूप अभिव्यक्ति की लाचारी के साथ ही हो गई थी। उनका एक शे’र याद आ रहा है- 

बक़द्रे  शौक़  नहीं  ज़र्फे  तंगना-ए-ग़ज़ल

कुछ और चाहिये वसुअत मेरे बयाँ के लिये

अर्थात् भावों के अनंत आयाम को खुलकर व्यक्त करने में ग़ज़ल का पटल संकीर्ण हैं। मुझे अपनी अभिव्यक्ति के लिये किसी और विस्तृत माध्यम की आवश्यकता है।

यही ‘कुछ और चाहिए’ छंदयुक्त पद्य काव्य को छंदमुक्त गद्य काव्य की तरफ ले जाता है, जिसे ‘एक साँस सब के हिस्से से’ कृति के लिए सोनी जी अपनी विधा बनती हैं। 

पायल जी की रचनाएं मुक्तछंद गद्य-गीत श्रेणी की हैं , इनमें प्रवाह के साथ नई कविता की कथ्य-प्रधानता और नवगीतों की मनः स्थिति प्रधानता दोनों हैं।

आज की विमोचित पुस्तक पर कुछ कहने के पहले शायरी की तासीर पर तीन बाते आप सब से कहने के साथ उसका उदहारण सोनी जी की इस कृति से भी देने का प्रयास करूँगा। 

पहली बात- 

दो शोअरा/ कवि/कवयित्री एक ही चीज को अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं, और दोनों दृष्टियां यदि तार्किक हैं, तो दोनों को ही पाठक सहजता से स्वीकार कर सकते हैं। 


खूबसूरत ताज का उदहारण लेते हैं-दो मशहूर शोअरा द्वारा इसके दो पहलू उजागर किये गए, और दोनों पाठको द्वारा स्वीकार्य हुए। 

फिल्म लीडर में जहाँ शकील बदायुनी साहब कहते है-

एक  शहंशाह ने  बनवा  के हसीं  ताजमहल 

सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है।


वहीं साहिर लुधियानवी साहब का ख़याल उनके विपरीत इन्क़लाबी है। साहिर कहते हैं- 

एक  शहंशाह ने  दौलत  का  सहारा  ले कर 

हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।

दूसरा उदहारण भी देखिये- जहाँ मजरुह सुल्तानपुरी साहब कहते है-

ए रुके-रुके  से  आँसू, ए  दबी-दबी  सी आहें 

यूँ ही कब तलक खुदाया गमे-ज़िन्दगी निबाहे।

वहीँ ‘तांबा’ साहब कहते हैं –

ज़िन्दगी दर्द  के साए में सकूँ पाती  है 

वर्ना हालत ए हैं कि जहन्नुम बन जाय।


दूसरी बात- भावभूमि एक होने पर भी दो शोअरा की शायरी के शब्द और उनका विन्यास उनके अभिधात्मक, लक्षणात्मक और व्यंजनात्मक सम्प्रेषण को प्रभावित कर सकता है। उदहरण के लिए आप को पचास-साठ साल पीछे ले चलते हैं। 


बारह वर्षों के अंतराल में भारतीय उपमहाद्वीप के दो देशों में एक ही भावभूमि पर दो फिल्मों में दो गीत लिखे गए। एक १९६१ में हिंदुस्तान में फ़िल्म 'हम दोनो' के लिए साहिर लुधियानवी साहब ने और दूसरा १९७३ में पाकिस्तान में फ़िल्म'बादल और बिजली'के लिए फ़ैयाज़ हसन साहब ने लिखा था। 


भावभूमि एक होने पर भी शब्द,संगीत और आवाज़ को आहिस्ता-आहिस्ता महसूस करे तो पाएंगे कि एक में जिस्मानी खिंचाव है, तो दूसरे में रूहानी लगाव।


दोनो गीतों की कुछ पंक्तियाँ आप के सामने रख रहा हूँ। साहिर साहब का गीत-

अभी न जाओ दिल तोड़ के, कि दिल अभी भरा नहीं

...

अधूरी आस छोड़ के, अधूरी प्यास छोड़ के 

जो रोज यूँ ही जाओगी, तो किस तरह निभाओगी...


फ़ैयाज़ साहब का गीत-

आज जाने की ज़िद ना करो, यूँ ही पहलू में बैठे रहो


कितना मासूम रंगीन है ये समाँ, हुस्न और इश्क़ की आज मेराज है

कल की किसको खबर जान-ए-जाँ, रोक लो आज की रात को...


तीसरी बात- शायर के सोच की नवीनता और विशिष्टता। 

अपने स्कूल के दिनों के एक संस्मरण को याद करते हुए डॉ नामवर सिंह जी बताते थे कि किस प्रकार त्रिलोचन जी ने उन्हें सभाजीत पाण्डेय ‘अश्रु’ की एक पंक्ति को सुनाकर उन्हें रचना-धर्मिता में नवीनता का बोध कराया। अश्रु जी जी वह पंक्ति इस प्रकार है- “अश्रु बुझे हुए दीप के ऊपर आ के पतंग जले तब जानें”। इस पंक्ति की अविधा ही कितनी नवीन और उत्प्रेरक है- जलते हुए दीप पर पतंगे का जल जाना कौन सी बड़ी बात है, बात तो तब बड़ी हो जब पतंगा बुझे दीप पर आकर जल जाय, व्यंजना की तो बात ही और है।


अब पायल जी की इस कृति से कुछ उदहारण देखिए। पायल जी इस पुस्तक की भूमिका में लिखती हैं- मुझे शब्दों के साथ पहलवानी करनी नहीं आती, मेरी कलम ने स्त्री पात्र को चुना, उनकी पीड़ा, अपेक्षा, इच्छा और उड़ान को तराशने की कोशिश की।


सोनी जी ने अपनी रचनाओं में, स्त्री जो न जी पा रही है, न मर पा रही है, का मार्मिम मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। पूरी पुस्तक में स्मृतिशेष बड़ी बहन खड़ी है, जीते हुए, संघर्ष करते हुए और मरते हुए। 


वह उस स्त्री की पीड़ा को शब्द देती हैं, जिसके पहलू में अँधेरा होते ही बैठ जाते हैं, उजाले में शराफत की बात करने वाले। वह उस स्त्री की बात करती है जो केवल धत्-धत् सुन पाती है। वह स्त्री जो बहिष्कृत है, तिरष्कृत है, वह स्त्री जिसे ब्याह के बाद बहुत कमी खलती है माँ की। सोनी जी की अपनी ज़मीनी सोच है, जो उनकी रचनाओं में परिलक्षित हुई है।


१९६२ में साहब बीबी और गुलाम फिल्म के लिए एक गीत शकील बदायुनी साहब लिखते हैं- न जाओ सैंया छुड़ा के बैंया, कसम तुम्हारी मैं  रो पडूँगी, पर पायल लक्ष्मी सोनी २०२३ में उनके विपरीत लिखती है- स्त्रियाँ रोती हैं /जब अपना कोई/ माथे पर चूमकर/ अपने हाथों में हाथ ले लेता है... 


१९६८ में फिल्म सरस्वतीचंद्र के लिए इन्दीवर एक गीत लिखते है- मै तो भूल चली बाबुल का देश, पिया का घर प्यारा लगे और लगभग उसी समय मिर्ज़ापुर के जनकवि जगदीश पंथी लिखते है- रुनुन झुनुक बाजे पायल तोर पउवाँ, बड़ा नीक लागे ननद तोर गउवाँ तो वहाँ से मात्र ८० किलोमीटर की दूरी पर कशी में सोनी लिखती हैं- इश्वर मेरे/ तुझसे प्रार्थना है मेरी /अगले जन्म में लड़की न बनाना... और रमिला राजपुरोहित भी यह लिखकर सोनी जी का समर्थन करती हैं –हर औरत आज/ अपने आप पर अफसोस जताए/ और मांगे भगवन से यही/ की अगले जमन मोहें बिटिया ना बनायें... 


सोनी जी पाठक की चेतना को झकझोरती हैं यह लिख कर- हँसती हुई औरतें/ कम मिलती हैं/ मुस्कराती औरतों के मुकाबले और अपनी रचनाओं में मनोविज्ञान की अध्येता के रूप में झलकती हैं। 


अंत में एड्रियाना की इन पंक्तियों के साथ मैं उन्हें उनकी बड़ी बहन, जो इस कृति के हर शब्द के साथ खड़ी है, जोड़ते हुए अपनी बात पूर्ण कर रहा हूँ-

My arms wide open/ Tears running down my face 

Ready for your return/ Even if it takes forever 


अर्थात् मेरी बाँहें सदैव फैली रहेंगी तुम्हारे लिए, इस आस के साथ कि मेरे सूखे आँसुओं को पोछने एक दिन तुम जरुर आओगी ....

¬-डॉ अनिल मिश्र

समीक्ष्य पुस्तक- 'एक सांस सबके हिस्से से'(काव्य संग्रह)

लेखिका- पायल लक्ष्मी सोनी

प्रकाशक- काव्या 

पब्लिकेशन,दिल्ली-20

ISBN-NO-978-93-95482-58-5

मूल्य- 199

पृष्ठ-133

अमेज़ॉन पर उपलब्ध

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