मुंबई: सच्चा रचनाकार गमले का फूल नहीं होता: रामदरश मिश्र | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
मुंबई। सच्चा रचनाकार किसी वाद-विवाद में स्वयं को बांटने और सीमित करने के बजाय विराट तथा विस्तृत फलक को आधार बनाकर रचनाकर्म में सन्नद्ध होता है। वह आयातित विचारों के पीछे नहीं बल्कि अपने जीवन तथा परिवेश के अनुभवों को साक्ष्य मानकर चलता है। जीवन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही उसे गौरवशाली बनाती है। उपरोक्त वक्तव्य वरिष्ठ रचनाकार राम दरश मिश्र ने राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिया।
सोमवार 14 अगस्त को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी और के एम अग्रवाल कॉलेज कल्याण के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी के वरिष्ठ रचनाकार रामदरश मिश्र के सौवें जन्मदिन की पूर्व संध्या पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। दीप प्रज्ज्वलन और महाराष्ट्र राज्य गीत के साथ आरंभ संगोष्ठी में शतवर्षीय मिश्र जी ने डिजिटल माध्यम से अपना ओजस्वी वक्तव्य दिया। आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी प्रसिद्ध ग़ज़ल -'जहां आप पहुंचे छलांगे लगाकर, वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे- धीरे' सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। बीज वक्ता के रूप में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष शीतला प्रसाद दुबे ने रचनाकार बारे में अपना वक्तव्य के देते हुए कहा कि मिश्र जी की रचनाओं में बार-बार जल, पानी और धरती जैसे शब्द आते हैं उसका कारण है कि दो नदियों के बीच बसे उनके गांव में कभी बाढ़ से फसलें नष्ट हो जाती थीं तो कभी सूखा पड़ने पर त्राहि मचती थी ।इसलिए उनके परिवेश का पानी ही उनकी आंखों का पानी बनकर रचनाओं में उतरा है। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाएं उनके जीवन और भारतीय संस्कृति तथा मानवीय मूल्यों की पक्षधर हैं। अकादमी वरिष्ठ रचनाकारों के जीवन और साहित्य केंद्रित समारोह आयोजित कर उनका गौरव करने के प्रति प्रतिबद्ध है।मुख्य अतिथि के रूप में पुणे विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर डॉक्टर शशि कला राय ने कथा साहित्य का उल्लेख करते हुए कहा कि राम दरश मिश्र जीवन के सरोकार के रचनाकार हैं। विशेष अतिथि के रूप में डॉटर सतीश पांडे ने राम दरश मिश्र को सहज रचनाकार के रूप में उल्लिखित किया। केएम अग्रवाल कॉलेज प्रबंधन समिति की ओर से ओमप्रकाश पांडे और प्राचार्या डॉ अनिता मन्ना ने उपस्थित विद्वानों का स्वागत किया।
इस अवसर पर उपस्थित अकादमी के सदस्य आनंद सिंह ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। सत्र संयोजक की भूमिका डॉ. मनीष कुमार मिश्रा ने निभाई । अग्रवाल महाविद्यालय की उप प्राचार्य डॉ अनघा राने एवं डॉ. संतोष कुलकर्णी उद्घाटन सत्र में अन्य प्राध्यापकों के साथ सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की।
उल्लेखनीय है कि उम्र के सौ सक्रिय वर्ष पूरे करने के साथ मिश्र जी रचनाकर्म में पूरी तरह सक्रिय हैं।
प्रथम चर्चा सत्र के अध्यक्ष के रूप में सोमैया महाविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता डॉ. सतीश पाण्डेय उपस्थित थे। प्रपत्र वाचक के रूप में डॉ. मिथिलेश शर्मा, डॉ. पल्लवी प्रकाश, डॉ. ऋषिकेश मिश्र, डॉ. महात्मा पाण्डेय, डॉ. उषा आलोक दुबे, डॉ. भगवती प्रसाद उपाध्याय और नाशिक से डॉ. गीता यादव उपस्थित थीं । सत्र संयोजन डॉ. अनघा राणे एवं आभार ज्ञापन डॉ.अनुराधा शुक्ला ने किया। द्वितीय चर्चा में अध्यक्ष के रूप में प्रोफ़ेसर शीतला प्रसाद दुबे एवं प्रपत्र वाचकों में डॉ. संतोष मोटवानी, डॉ. श्याम सुंदर पाण्डेय, डॉ. दिनेश पाठक, डॉ. सत्यवती चौबे, डॉ. तेज बहादुर सिंह एवं वर्धा से श्री अमित चौहान उपस्थित थे। सत्र संयोजन डॉ महेश भिवंडीकर एवं
आभार ज्ञापन डॉ. रीना सिंह ने किया ।
समापन -सत्र के अध्यक्ष के रूप में प्रोफ़ेसर अनिल सिंह ( मानविकी संकाय आधिष्ठाता, मुंबई विद्यापीठ ) उपस्थित थे। सत्र संयोजन डॉ. राज बहादुर सिंह ने किया। अंत में आभार ज्ञापन डॉ. मनीष कुमार मिश्रा ने किया ।
इस संगोष्ठी को सफल बनाने में श्री उदय सिंह, श्री सुहास भगत, श्री विजय वास्तवा, डॉ दहिवले, डॉ जाधव, डॉ अनघा राने, डॉ संतोष कुलकर्णी के साथ सभी शिक्षकों ,शिक्षकेतर कर्मचारियों एवं छात्रों ने पूरा सहयोग दिया।
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