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सबसे बड़ा छल | #NayaSaveraNetwork

नया सवेरा नेटवर्क

हम भारतवासियों के साथ सबसे बड़ा छल 1885 में हुआ जब एक अंग्रेज अफसर ने कुछ भोले भाले भारतीयों को गुमराह कर कांग्रेस नामक पार्टी का गठन किया। जिसका मूल उद्देश्य था कि 1857 जैसी क्रांति भारत में फिर न हो। इस पार्टी को राजनीतिक संरक्षण अंग्रेजो द्वारा दिया गया। यह पार्टी भारत में अंग्रेजों की स्लीपरसेल के रूप में अपना काम शुरू किया। बाहर दिखावे के लिए आजादी की लड़ाई दिखी। जिससे प्रभावित होकर बहुत से देशभक्त इनके साथ जुड़ते गये। कुछ प्रलोभन पर कुछ देशभक्ति का जज्बा लेकर कांग्रेस के साथ हो लिए। लेकिन अंदरखाने क्या हो रहा है। उन भोले भाले जोशीले नौजवानो को पता ही नहीं था। उधर अंग्रेजी शासन अपने यहाँ दर्जनो स्लीपर सेल तैयार करने में दिन रात जुटी रही। जिसमें मोहन करमचंद्र गाँधी प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। उनके साथी बने मोहम्मद अली जिन्ना, बाबा भीमराव अम्बेडकर, पं. जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि। जब ए पूरी तरह तैयार हो गये कि अब ये सब भारत में अंग्रेजों की ढाल बनकर काम कर लेंगे। तो अचानक से 1915 में महात्मागाँधी को आजादी का महानायक बनाकर भारत में प्रोजेक्ट कर दिया गया।

अंग्रेजों ने महात्मा गांधी को इतना चमकाया था कि भारतवासी उनके स्वागत में पलकें बिछा दी। शुरू हो गया हम भारतीयों के साथ सबसे बड़ा छल।


इधर हमारे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। जिसकी अगुवाई पं. रामप्रसाद बिस्मिल जी कर रहे थे। जिनके साथ आजादी के दिवाने हर कुर्बानी देने के लिए तत्पर थे। उसी समय में ए उपरोक्त चार स्लीपर सेल भारत में ट्रेंड होकर प्रवेश किए और आजादी के आंदोलन को हाईजैक कर लिए। शुरू हो गया पाखंड। महात्मा गाँधी द्वारा दांडी यात्रा को छोड़ कोई भी आंदोलन लक्ष्य तक नहीं गया क्यों? यह विचारणीय प्रश्न सदा गाँधी जी छोड़ते गये। जिससे खीझकर इनकी अंदर की चाल को समझकर कई आंदोलनकारी इनसे अलग होते गयें जैसे चंद्रशेखर आजाद, हेगड़ेवाल, सुबाषचंद्र बोस प्रमुख रहे।


इनकी ऊपरी गतिविधि तो भारत की तरफ थी पर आंतरिक गतिविधि भारत विरोधी ही रही। जिसके कई प्रमाण मिलते हैं। जैसे असहयोग आंदोलन जब चरम पर था। लोगों को लगने लगा कि अब अंग्रेज भारत छोड़ देंगे तो आंदोलन वापस ले लिए। 

क्यों? आज तक किसी को पता नहीं चला। खिलाफत आंदोलन चलाए भारत के लिए नहीं तुर्की के लिए। 

क्यों? सवाल का जवाब नहीं किसी कांग्रेसी के पास। भगत सिंह राजगुरू सुखदेव का मुकदमा लड़ना तो दूर पिटीशन पर हस्ताक्षर तक नहीं किए क्यों? सुबाष चंद्र बोस जी को इतना मजबूर किए कि उनको अलग राह अपनानी पड़ी। जबकी वो कांग्रेस के अध्यक्ष थे। गाँधी को भय सताने लगा था कि कहीं यह पार्टी और यह आंदोलन सुबाष बाबू हथिया लिए तो हमारे सपने पर पानी फिर जायेगा। साबरमती आश्रम जो कई बीघे में फैला है इनको कैसे मिला क्या ये वो जमीन खरीदे थे। उस आश्रम टेलीफोन कैसे लगा जो तब अंग्रेजों के सिवाय किसी के पास नहीं था। झंडे का रंग भगवा से तिरंगा करना ये सारी गतिविधियाँ गाँधी को संदिग्ध बनाती हैं। 

अब सवाल ए उठता है कि अंग्रेजों ने हर उस व्यक्ति को कुचल दिया जो ब्रिटिश शासन के विपरीत थे। तो गाँधी नेहरू जिन्ना आदि को वीवीआईपी व्यस्था क्यों दे रहे थे। यदि कांगियों वामियों की माने तो सबसे खतरा तो ब्रिटिश शासन के लिए यही चार चौकड़ी थे|तो वीर सावरकर को ही कालापानी क्यों?जबकी उन्होंने तो किसी की हत्या नहीं की। वो तो विचारक थे। वो तो कभी हथियार नहीं उठाये। तो उनको दो बार सशक्त  आजीवन कारावास की सजा क्यों हुई। इस पर हम भारतवासियों को मंथन करना अति आवश्यक है। गाँधी नेहरू आदि पकड़े जाते थे तो मामूली सजा वो भी वीवीआईपी व्यवस्था के साथ जैसे आजके भ्रष्ट नेताओं को मिल रही है। वहीं भगत सिंह आदि को फाँसी! ये यह दर्शाने के लिए काफी नहीं है क्या? जिससे अधिक खतरा वो पूरी सजा भी नहीं काटा और जिससे कम खतरा उसको फाँसी या गोली मिली। इससे ए बात साफ है कि उपरोक्त उल्लिखित चार चौकड़ी आजादी की लड़ाई तो बिल्कुल नहीं लड़ रहे थे।


जिस भगवे के नीचे सभी भारतीय एक होकर आजादी की लड़ाई में कूद रहे थे। गीत गाते थे मेरा रंग दे वसंती चोला। उसका रंग बदलने का क्या औचित्य था। जहाँ तक मेरी समझ में आया वो ए कि गाँधी के मन में भगवे से घृणा थी। भारत को फिर से गजवा ए हिन्द बनाने की कुत्सित खिचड़ी पक रही थी। इसलिए भगवा जो क्रांति का प्रतीक था उसे हटवा दिया। और झंडे का रंग तिरंगा करवा दिया। झंडे का रंग तिरंगा करना भी देश के धोखा था। दलाल कांग्रेसियों ने पहले ही सब कुछ तय कर लिया था कि देश जब आजाद होगा तो हम किस तरह लोगों को बेवकूफ बनाकर इस देश को लूटेंगे। इसकी शुरुआत झंडे से हुई। पहले झंडा बदल दिया गया। फिर धीरे धीरे धर्मनिरपेक्षता गढ़ी गई। पहले एक टुकड़ा किया गया। बना पाकिस्तान। जिन्ना को खुश कर दिया गया। फिर 370 के जरिए काश्मीर को चालांकी से फारुख को सौंप दिया गया। काश्मीर भारत  का हिस्सा 2019 के पहले तक नहीं रहा। 

कुल मिलाकर देश के साथ छल झंडे के रंग बदलने से ही शुरू हो गया था। बड़ी चतुराई के साथ भगवा जो भारत की पहचान था उसे बदलकर तीन रंग किया गया। आजादी के बाद धारा लगाकर देशवासियों को बंदिश में रखा गया। अपने मजे कियेजिस तिरंगे की आज कसमें खाई जाती हैं वह भी हमारे साथ धोखा ही है कोई मुसलमान यदि तिरंगा फूँक दे तो कुछ नहीं होता हिन्दू गलती से उल्टा फहरा दे तो देशद्रोह हो जाता है। 

क्यों? तो बताइए हम आजाद कहाँ हैं जिस बंदेमारम गीत को गाते हुए हमारे आजादी के दिवाने फाँसी पर झूल जाते थे|उसे हटाकर जन गण मन गीत को राष्ट्रगीत घोषित करवाये, क्यों? द्वितीय विश्वयुद्ध में जब नेताजी सुबाष चंद्र बोस अपनी आजाद हिंद फौज लेकर भारत के नगरों से अंग्रेजों को खदेड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे तो भारतियों को उनसे लड़ने के लिए क्यों लगाये|तब इनकी अहिंसा कहाँ गई थी|जब आजादी अहिंसा से मिली है तो उन जवानो को मौत के मुँह में क्यों ढकेल दिए|

     कारण बस ए था कि भारत को फिर से मुगलिया राष्ट्र बनाना था|इसलिए समझौते पर समझौते किए गये|भारत के टुकड़े किए गये|धर्म के आधार पर किया गया|जब धर्म के आधार पर किया गया तो सभी मुसलमानों को वहाँ भेज दिया जाना चाहिए था मगर नहीं भेजा गया क्यों? प्रश्न वही और जवाब वही कि भारत को गजवा ए हिंद बनाना था|इसीलिए भारत को धर्मनिर्पेक्ष देश बनाया|संविधान लिखवाया जिसमें आरक्षण की व्यस्था करवा के हिन्दुओं को लड़कर एक न हों और मुसलमानो को पर्सनल ला दिलवाकर गजवा ए हिन्द को स्थापित करना लक्ष्य था|बहुत हद तक सफल भी हुए पर सपना अधूरा रह गया|

      एक आक्रांता के सम्मान में जो गीत गाया गया था उसे राष्ट्रगीत बनवाया|जानते हैं क्यों बंदेमारतम को नहीं बनने दिया|क्योंकी बंदेमारतम भगरतीयता को परिलक्षित करता था|और जन गण मन गाँधी की महिमा व कर्जन की महिमा परिलक्षित कर रहा है|इसी लिए जन गण मन को बंदिश के तौर पर बाँध दिया गया|यदि इसपर कोई बोलेगा कि गलत है तो वह गलत होगा|मुसलमान को छोड़कर|समझ में नहीं आया न कि मुसलमान को यह सब छूट क्यों? तो सच बात यह है कि 1947 में मुसलमान ही आजाद हुए थे|उनको एक अलग देश भी मिला|उसके बाद भी भारत में वो रहे और आजादी के सब सुख भोग रहे हैं|उनके लिए अलग विधान|वे तिरंगे को नमन करें या न करें इसकी छूट|वे जन गण मन या बंदेमारतम गाये या न गायें उनकी मर्जी|वो देश फूँक दें उनकी मर्जी|वो आजाद हैं|पर हिन्दू ऐसा करेगा तो दंडित होगा|हिन्दू मंदिरों से कर लिया जाता है जैसे मुगल शासक लेते थे|और मस्जिद को अनुदान उनके मौलवियों को सरकारी वेतन सब मिलेगा|ऐसा विधान यहाँ बनवाया गया|ए सब हम हिन्दुस्थानियों के साथ छल नहीं तो और क्या है|

पं.जमदग्निपुरी


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