वाराणसी: मित्रता हो तो सुदामा और श्रीकृष्ण जैसी: रंगनाथाचार्य | #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
वाराणसी। मित्रता करो तो भगवान् श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताए मदद कर दे। आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गयी है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है तब तक मित्रता रहती है। ये बातें वृंदावन के संत स्वामी रंगनाथाचार्य ने गुरुवार को कहीं। वह दशाश्वमेध स्थित शास्त्रार्थ महाविद्यालय में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम सत्र में सुदामा चरित्र की कथा सुना रहे थे।
उन्होंने कहा कि सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर मित्र कृष्ण से मिलने द्वारकापुरी जाते हैं। जब वह महल के द्वार पर पहुंचते हैं तब प्रहरियों से कृष्ण को अपना मित्र बता कर अंदर जाने की बात कहते हैं। सुदामा का प्रहरी उपहास उड़ाते हैं। सुदामा अपने मित्र से बिना मिले ही लौटने लगे। तभी एक प्रहरी महल के अंदर जाकर भगवान श्रीकृष्ण को बताता है कि द्वार पर सुदामा नाम का एक दरिद्र व्यक्ति खड़ा है और आपका मित्र बता रहा है। द्वारपाल की बात सुनकर भगवान कृष्ण नंगे पांव ही दौड़े चले आते हैं और सुदामा को गले लगाते हैं।
कथाव्यास ने कहा कि जो काम प्रेम के माध्यम से संभव है। वह हिंसा से संभव नहीं हो सकता है। प्रवचन के बाद कथा मनोरथी राष्ट्रपति पुरस्कृत पूर्व प्राचार्य डॉ. गणेश दत्त शास्त्री, डॉ. आमोद दत्त शास्त्री,अभिषेक मिश्र, डॉ. विनोद राव पाठक, डॉ.पवन शुक्ला, रवि टंडन, नितेश चतुर्वेदी, सुनील मिश्र, मनोज मिश्र आदि ने व्यासपीठ और पोथी की आरती उतारी।
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