भारतीय महावाणिज्यदूत ने सरिसवा नदी प्रदूषण मामले को विदेश मंत्रालय के साथ उठाया| #NayaSaveraNetwork
नया सवेरा नेटवर्क
- केवल छठ पूजा के समय स्वच्छ की जाने वाली नदी की स्वच्छता को हमेशा के लिए कायम रखने की डॉ. शलभ ने की अपील
पर्यावरण और मानव जीवन की रक्षा के लिए सरिसवा नदी प्रदूषण समस्या का स्थायी हल निकालने की शिक्षाविद डॉ. स्वयंभू शलभ की अपील के आलोक में भारतीय महावाणिज्यदूत नीतेश कुमार ने सरिसवा नदी प्रदूषण मामले को विदेश मंत्रालय के साथ उठाया है। वहीं मुख्यमंत्री कार्यालय ने मामले को शहरी विकास एवं आवास विभाग तथा पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को आवश्यक कार्रवाई हेतु भेजा है।
डॉ. शलभ ने इस संदर्भ में नेपाल के वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रदीप यादव एवं बीरगंज महानगरपालिका प्रमुख राजेशमान सिंह को भी नदी की दुर्दशा से अवगत कराते हुए इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने का आग्रह किया है।
डॉ. शलभ ने कहा है कि भारत और नेपाल दोनों ही देश पर्यावरण संरक्षण के हिमायती हैं और दोनों के बीच आपसी गहरे सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध हैं परंतु वर्षों से चली आ रही इस साझा समस्या का स्थायी उपाय अभी तक नहीं किया जा सका। डॉ. शलभ ने चिंता जताई कि इस नदी के प्रदूषण से आसपास का भूगर्भ जल भी प्रदूषित हो सकता है। इस नदी के प्रदूषण ने न केवल भारत नेपाल सीमा क्षेत्र के पर्यावरणीय खतरे को बढ़ाया है बल्कि प्रकृति की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के नियमों के आगे एक बड़ा प्रश्नचिह्न भी खड़ा कर दिया है। सरिसवा जैसे प्रदूषण के प्रमुख स्रोत को स्वच्छ किये बगैर गंगा को भी स्वच्छ नहीं किया जा सकता। इस समस्या पर नेपाल सरकार के साथ तत्काल बातचीत कर औद्योगिक इकाइयों द्वारा अशोधित कचरे को नदी में गिराए जाने पर रोक लगाया जाना जरूरी है।
डॉ. शलभ ने आगे कहा कि छठ पूजा के समय मोतिहारी जिला प्रशासन द्वारा भारतीय महावाणिज्यदूत के माध्यम से पर्सा और बारा (नेपाल) जिला प्रशासन से आग्रह किया जाता है और कुछ दिनों के लिए नदी में अपशिष्ट डालना बन्द कर दिया जाता है। छठ पूजा बीतने के बाद फिर स्थिति जस की तस हो जाती है। ऐसा वर्षों से होता चला आ रहा है। यह एक गंभीर सवाल है कि जो नदी छठ पूजा के समय साफ हो जाती है उसकी स्वच्छता को हमेशा के लिए कायम क्यों नहीं रखा जा सकता।
विदित है कि भारी मात्रा में रासायनिक अपशिष्टों का भार लेकर यह नदी भारत नेपाल सीमा रक्सौल होकर सिकरहना (बूढ़ी गंडक) में मिलती है जो आगे चलकर खगड़िया के पास गंगा में मिल जाती है। डॉ. शलभ द्वारा नदी संरक्षण से जुड़े सभी मंत्रालयों व विभागों तक इस मामले को पहुंचाया गया है लेकिन जमीनी स्तर पर अभी तक अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आया है।
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