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Poetry: सभ्यताओं के बिना....!

नया सवेरा नेटवर्क

"सभ्यताओं के बिना....!

ब्रह्माण्ड में.....!

जाने कितने प्रकाशमान पिंड हैं

चमकती ज्योति पुंज फैलाए हुए

अपने-अपने नियमों....और...

अपने-अपने सिद्धांतों पर....

विज्ञान ने भी दी है मान्यता इनको

किया है इनका नामकरण भी.... 

यही नहीं...गल्प कथाओं में भी....!

खूब ज़िक्र मिलता है इनका....

पर....सच है कि...आज भी....

यह कल्पना का ही विषय है....!

विज्ञान और गल्प कथा,

दोनों के लिए ही.....

कि इन जगहों पर.....

सभ्यता का विकास हुआ है या नहीं

यहाँ रोग-दोष,सुख-दुख,हानि-लाभ,

जीवन-मरण,यश-अपयश...है या नहीं...?

यहाँ परियों का देश....है या नहीं....?

किन्नर नरेश के राजमहल का....!

अस्तित्व.....है या नहीं....?

यहीं पर मित्रों....सभी जानते हैं...

सभी को अच्छे से पता है....कि...

एक चमकता हुआ प्रकाश पिंड....!

अपनी नियमित गति से....

संपूर्ण वैश्विक जगत को....

दिन-रात प्रकाशमान किए है....

जिसे "सूर्य" कहा है....विज्ञान ने...!

शास्त्रों ने....ज्योतिष ने....साहित्य ने

और....गाँव-देश-समाज ने भी....

निष्कर्ष यही है कि.....!

सूर्य कहाने के लिए,

सूर्य बनने के लिए...

आवश्यक है...

सभ्यता का विकास होना....

सभ्यताओं के बिना....!

किसी प्रकाशपिंड की पहचान नहीं

किसी प्रकाशपिंड का अस्तित्व नहीं

और....कमोवेश....यही सिद्धान्त....!

सच है....इस भौतिक जगत के....

मानव समाज के लिए भी....

जहाँ सभ्यता के विकास के बिना...!

व्यक्ति की पहचान नहीं...और....

व्यक्ति के व्यक्तित्व का अस्तित्व नहीं....


रचनाकार.....

जितेन्द्र कुमार दुबे

अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ


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