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Poetry: श्वेत वसन.....!

नया सवेरा नेटवर्क

श्वेत वसन.....!


देखा था मैंने.......!

सचमुच....बहुत ही करीब से....

निश्पृह भाव तुम्हारे...और....

तेरे नैनों की कातर दृष्टि,

संग में इसके...झर-झर आँसू वृष्टि...

श्रवण भी  किया था मैंने....!

तेरे योग-वियोग के गान....

इन सबका....मैंने भी रखा था मान..

तभी तो मन में था यह अभिमान....!

कि एक दिन होगा....जरूर बिहान...

गंध-सुगंध भी तेरी.....!

भले खेलती रही....अठखेली...

पर हमने तो....आसानी से बूझी थी..

प्रणय निवेदन की वह प्रथम पहेली...

पढ़ी भी मैंने.....मौन भाव से....!

तेरे रोम-रोम की सिहरन....और....

अहसास किया था मैंने.....

तेरी देह-यष्टि का मधुर-मिलन... 

संग इसी के देखी थी मैंने,

तेरे दिल की घटती-बढ़ती धड़कन....

भूल कहाँ सकता हूँ प्रिये....!

कच्ची दीवारों पर देखी...

तेरी परछाई की सिकुड़न...

दिल में था....या रहा बहुत ही दूर...

संशय इसका....बना रहा भरपूर...

पर प्यार में तेरे पगली.....!

मैं तो था चहुँ-दिश मशहूर....

महसूस किया था मन ने मेरे....!

तेरे मन-मन्दिर की हलचल....

और तो और... प्रिये....

विश्वास अटल था तब यह मेरा...

कि हरपल मिलने को आतुर था...

तेरा निश्छल-कोमल-चंचल मन....

और कहूँ क्या मैं पगली.....?

बातें विह्वल अन्तर्मन की....!

तब तो...बस एक ही अभिलाषा थी..

कि....मेरा ही घोषित हो जाये...

तेरा तन-मन और बदन....

इस आशा-प्रत्याशा में ही....!

मैंने किये कई-कई जतन....

पर तुम तो करके....पार गगन....

कर गई हो परियों के देश गमन..

कहता हूँ...खाकर सौगन्ध तुम्हारी...

कि अब तो मुझे....कष्ट बहुत है भारी

यह सोच -सोच रोते हैं मेरे दोनों नयन

कि इतनी भी जल्दी क्या थी....?

जो ओढ़ लिया तुमने श्वेत वसन...

जो ओढ़ लिया तुमने श्वेत वसन....


रचनाकार.....

जितेन्द्र कुमार दुबे

अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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