Poetry: लिखना कब...
नया सवेरा नेटवर्क
लिखना कब
लिखना तभी, जब तुम महसूस करना, तुम लिखना तब, जब एहसास करना।
लिखना जब भी, तो वही लिखना, जो तू चाहता है लिखना।
लिखना तभी, जब झकझोर दे तुम्हारी अंतरात्मा।
तुम लिखना तब, जब नींद न आए, तुम्हें लिखे बिना,
जब हो जाओ हताश और बेचैन, तभी अभिव्यक्ति की कलम उठाना।
लिखना तभी, जब लिखने का उत्तरदायित्व समझ जाना।
तुम ज़रूर लिखना, लिखते रहना, मगर लिखने की लीक पर मत टिके रहना।
लिखना ऐसे कि जैसे पानी लिखती है, अमिट लिखावट पत्थर पर। तुम ऐसे लिखना कि जैसे कुम्हार, लिखता है गीली मिट्टी पर।
लिखना ऐसे कि सही चोट करे, जैसे झरना करता है चट्टानों पर।
तुम ऐसे लिखना कि भीग जाए मन,
जैसे माँ को छू जाता है शिशु का करुण रुदन।
लिखना ऐसे कि जिससे फ़र्क दिखे, जैसे उजाला कर देता है दिन और रात में फ़र्क।
लिखना ऐसे कि जिससे हो जाए परिवर्तन, जैसे तटस्थ रहकर सूरज बदल देता है मौसम।
यदि ऐसे लिख सको तो ही लिखना, अन्यथा लिखने का स्वाँग न करना।
- संतोष झा
अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, कोंकण रेलवे


