Article: प्रेम करने के लिए भला कौन सा मौसम बुरा है : बारहमासा
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वंदना मिश्रा |
नया सवेरा नेटवर्क
‘प्रेम करने के लिए भला कौन सा मौसम बुरा है’ : बारहमासा
चित्रा पंवार एक ऐसी कवयित्री और मित्र हैं ,जिनका नाम लेते ही मन मिठास और गर्व से भर जाता है ,अद्भुत शब्द संरचना ,गम्भीर और कोमल भाव एक साथ । कुल मिला कर बड़ी कवयित्री , पर बात करो तो ,मासूम बच्ची ,यही भाव लेकर कविता संग्रह पढ़िए तो बार- बार चौंक जाइये ,जीवन को कितना समझती है ये बच्ची !
अपने प्रथम संग्रह से ही साहित्य जगत में स्थान सुरक्षित कर लेने वाली चित्रा इस बार
समकालीन कवियों में तेजी से अपनी पहचान बना रही युवा कवि चित्रा पंवार के हिंद युग्म प्रकाशन से आए नए काव्य संकलन ‘बारहमासा’ के साथ आई हैं ।
बारह महीने का वर्णन हिंदी साहित्य में कोई नई बात नहीं है ,जायसी के बारहमासा के बाद क्या बच गया कि लिखेगा कोई ? पर ये इस संग्रह को पढ़ने से पहले की बात थी ।
यहाँ हर महीने से जो लगाव दिखता है कि जैसे कलेंडर से निकल कर महीने शुक्रिया कह रहे हैं ।
यहाँ अपने प्रिय के वियोग में डूबी प्रेमिका / पत्नी का स्वर नहीं वरन् एक ऐसी प्रखर स्त्री का स्वर है जो सामाजिक, राजनैतिक से पहले मानवीय चेतना से परिपूर्ण है। यह सर्वहारा, किसान और मजदूरों के अधिकारों के प्रति जागरूक और आवाज उठाने वाली स्त्री का स्वर है। इसमें प्रेम करने वाली स्त्री है तो खेती और मज़दूरी करती स्त्री भी है और सर्वहारा वर्ग भी है। मजदूर दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस , वेलेंटाइन डे नई दृष्टि से देखे गए हैं । कई उल्लेखनीय ऐतिहासिक घटनाओं को भी उनके महीनों के क्रम में रेखांकित करता है जिनमें वो घटी। इसमें प्रेम है तो विश्वास और समर्पण भी, प्रकृति है तो रंग और उल्लास भी ।चित्रकारी में निपुण चित्रा प्रकृति को नए अंदाज़ में देखती हैं । ये महीने हमारी आपकी तरह साँस लेते ,सोचते और प्रतिक्रिया करते हैं । केवल पन्ने पलट देने से से ये हटाए नहीं जा नहीं सकते ,और हर महीना अलग तरह से उपस्थिति दर्ज़ कराता है ।
महीनों को इस तरह भी याद किया जा सकता है, ये देख कर अच्छा लगता है । ये दिनों को काटना नहीं ,जीना सिखाता है ।
चित्रा की कविताओं में प्रेम की आकांक्षा है ,पर आत्मसम्मान की क़ीमत पर नहीं । उन्हें प्रेम चाहिए पर स्वतंत्रता भी ,और स्वाभिमान भी -
“स्त्री चाहती है
अप्रैल सा प्रेमी
जो उसके मौन कंठ को
प्रेम से
पुकारकर कहे -
ख़ूब गाओ कोयल
मैं सुनूँगा तुम्हारे गीत ।”
शायर के शब्दों में कहें तो
“मुझको मालूम है कि उसका दिल सिर्फ़ सजदे से खुश नहीं होगा
मसअला ये है कि मेरा मेहबूब खूबसूरत भी है ज़हीन भी है।”
उनके महिनों में सिर्फ़ प्रेमी नहीं किसान भी हैं ।इसी लिए अप्रैल उन्हें किसान की चिर प्रतीक्षा का मीठा फल लगता है ।
“अप्रैल मात्र एक मास ही नहीं
अपितु धरा की देयता के प्रति
कृतज्ञता के उत्सव का नाम है “
पृष्ठ -53
अप्रैल के प्रति सम्मान है ।जब सब छुट्टी मना रहे हैं, तो -
‘ “अप्रैल ने कहा मैं ना जा सकूंगा अभी मैं किसान के साथ चैत काटूँगा ।”
- पृष्ठ 49
मई ,कड़वे मगर औषधीय गुणों से पूर्ण नीम , सामान्य समझे जाने वाले पर मेहनतकश और समाज के लिए अति आवश्यक मज़दूरों की बात करती है । झुलसती मई पर इससे ज़्यादा प्रेम की शीतल फुहार कौन बरसा सकता है -
“अगर आते ही मजदूरों के/ हक़ हिस्से की बातें करोगी तो /प्रति उत्तर में जलते हुए /अंगारे ही मिलेंगे ना /फूल तो बरसने से रहे तुम पर ।
-पृष्ठ 60
उस मई में एक नया सौंदर्य बोध है ,जब सब नीम की कड़वाहट देख रहे थे । मई माह ने उसका सौंदर्य देखा और उसे फूलों से भर दिया -
“सफेद फूलों से लदा नीम मुस्कुराकर कह रहा है शुक्रिया मई “
- पृष्ठ 58
नववर्ष और छब्बीस जनवरी के लिए याद किया जाने वाला,जनवरी गाँधी जी की निर्मम हत्या का माह भी है इसे कैसे भूल सकते हैं -
तुम्हें याद रखने / प्रेम करने के/ और भी कारण है जनवरी /तुम बस नए साल का /पहला महीना पहली तारीख /ही नहीं हो ।
-पृष्ठ 24
“जिन्हें कहते थे मामूली सा
एक बूढ़ा आदमी
हैरान है वह
फिर दुनिया कैसे
एक बूढ़े से डर गई
जनवरी चली गई “
पृष्ठ -25
जिन्हें हम प्रिय कहते समझते हैं उनसे क्या चाहते हैं ? थोड़ा सा ज़्यादा वक़्त ,थोड़ा सा अतिरिक्त प्यार -
“अबकी बार आना तो /जेब में रख लेना थोड़ा सा ज़्यादा वक्त /और थमा देना मुझे /जैसे 28 की फरवरी की हथेली पर /रख देता है कोई कोई साल उन्तीसवां दिन
-पृष्ठ 32
कितनी कोमल अनुभूति है -
“इस वैलेंटाइन डे नहीं कहूंगा /आई लव यू /ऑफिस से घर लौटोगे तो / ढ़ेर सारा प्यार मिलकर बनाऊंगा/ तुम्हारे लिए एक कप चाय ।
-पृष्ठ 33
कविता पढ़ कर लगता है जैसे सचमुच किसी ने हाथ में चाय का प्याला पकड़ा दिया हो ,जिसे आप सुकून से पी सकते हैं । थोड़ा सा वक़्त ,चाय का कप ,प्रिय का साथ कितनी कम की लेकिन कितनी दुर्लभ आकांक्षा है ।
खिले फूल को न तोड़ कर भी हम अपने प्रेम का प्रदर्शन कर सकते हैं । जो जीवन बचाता है सच्चा प्रेम तो वही कर सकता है -
“ सुबह-सुबह डाली पर/ खिले गुलाब देख /सहसा तुम याद आ गई/ …..जीवन लेना नहीं /बचा लेना प्रेम है।”
- पृष्ठ 35
यह कविता पढ़ अज्ञेय की कविता ‘साम्राज्ञी का नैवेद्य दान ‘कविता याद आ गई ।
चित्रा जुलाई को यूँ ही नहीं क्रांतिकारी कहती हैं ,इसी माह में सावित्री बाई फुले ने स्त्री पाठशाला का प्रारंभ किया था ।
स्त्री शिक्षा जिसने स्त्री स्वतंत्रता और स्वाभिमान का द्वार खोल दिया -
“दुनिया की पहली क्रांतिकारी स्त्री थी
जुलाई
इसने पैदा की
क्रांतिकारी बेटियाँ
….
कागज़ कलम से प्रेम करना सीखो
लड़कियों !
ज़रूरत पड़ने पर
तुम्हारे लिए यही बनेंगे
बाधाओं की नदी का पुल ।”
–79
रमा शंकर यादव विद्रोही जी की पंक्तियाँ याद आती हैं -
“मैं तुम्हें इसलिए प्यार नहीं करता
कि तुम बहुत सुंदर हो
और मुझे बहुत अच्छी लगती हो
मैं तुन्हें इसलिए प्यार करता हूँ
कि जब मैं तुम्हें देखता हूँ
तो मुझे लगता है कि क्रांति होगी “
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प्रेम में एक हो जाना तो ठीक है ,पर किसी का भी अस्तित्व ख़तरे में न पड़े । यहीं वो बिंदु है जहाँ चित्रा सामान्य स्त्री विमर्श की कवयित्रियों से भिन्न दिखती है । आज़ादी का मतलब है सबकी आज़ादी का सम्मान करना ।
“मिलना तो आधिपत्य से न मिलना
जैसे जनवरी मिलती है फ़रवरी से
मिलना तो एक दूसरे की छाया में
डूबने डूबा लेने के युद्व से बचना
…..
मिलना तो एक बराबर होकर मिलना
जैसे इकतीस की जुलाई से
आकर मिलता है
इकतीस का अगस्त ।”
पृष्ठ -83
प्रेम की चाहत भी और उसके बुलावे के प्रति आदर भी ।
“कोई साथ चलने को पुकारे तो
दौड़ कर स्नेह से थाम लेना
उसका हाथ “
हिंदी दिवस पर व्यंग्य, दुख और प्रेम सभी का मिला जुला स्वर सुनने को मिलता है ।
“प्रेम करने के लिए भला कौन-सा मौसम बुरा है!
न फ़रवरी न नवंबर…”
माँ बार बार आती हैं चित्रा की कविताओं में ,और उनके प्रति सम्मान इतना कि जहाँ कुछ गलतफहमियां दिखी वहाँ स्वर पुरुष का हो जाता है ,जैसे ख़ुद के स्वर में यह बात कहना भी गुनाह है ।माँ कहने को सिर्फ़ नौ माह देती है पर…
“मैंने तपाक से कहा हाँ हाँ, बस नौ माह ही न! ….माँ होती तो उसका हाथ माथे से लगाकर कहता / मुझ ग़रीब को माफ़ करना माँ ।”
सितंबर, हिंदी दिवस ,मातृ भाषा ,माँ सब एक दूसरे से मिल कविताओं को नया रूप ,नया स्वर देते हैं -
“ बड़े दिनों बाद / बच्चे घर आए हैं आज/ माँ कल दीवारों से बात करती थी / माँ कल फिर दीवारों से बात करेगी । “-97
“दाता से झोली भर लेकर
एक कण देकर याचक बोला
जाओ कृतज्ञ रहो
मैंने तुम पर उपकार किया
हिंदी हँसी
माँ भी हंसी
हंसी ज़ोर से
शिक्षा गुरु पिता और पृथ्वी
अपना दिवस मनाने वालों के ऊपर ।”
कितना मार्मिक है ,यह समझना कि-
“बाहर से हरी-भरी दिखने का उत्तम अभिनय करना जानती
अपनों के रंग में रंगी माँ
कब का भूल चुकी थी अपना असली रंग
उपेक्षित सितंबर थी माँ
उसमें गहरे समाए थे सारे मौसम/
मगर वह किसी में नहीं थी ।”
-पृष्ठ 93
माँ के हाथ से बुने स्वेटर में जो भाव था वो बाज़ार से आए में कहाँ !
“जब से छोड़े हैं पहनने /माँ के हाथ से बुने डिज़ाइनदार स्वेटर/ अब कोई स्त्री नहीं रोकती /बीच राह में-/
बहुत याद आता है/ बचपन वाला/ वीआईपी दिसंबर “
गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा ‘आग बड़वाग्नि से बड़ी है आग पेट को “
जून के ताप को भी मात देती पेट की आग के लिए चित्रा लिखती हैं -
“पेट की आग के आगे
यह ताप /
कुछ भी नहीं /
इतना सुनकर
सिकंदर बन
दुनिया फ़तह करने निकले
जून के सूरज का
मुँह लटक गया ।”-पृष्ठ -67
बहुत सी खूबसूरत और विचारशील कविताओं का संचयन है ,यह संग्रह । मित्र चित्रा को अनेकशः बधाई और शुभकामना ।
प्रोफेसर वंदना मिश्रा
हिन्दी विभाग, जी.डी. बिन्नानी पीजी कॉलेज, मिर्जापुर

