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Poetry: सितारा, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं होगी

नया सवेरा नेटवर्क

सितारा, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं होगी

–डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा


ही-मैन नहीं रहे…

पर सच कहें तो वे कहीं गए नहीं,

बस इस पृथ्वी से उठकर अपने किसी नए किरदार में,

किसी और आकाशगंगा में, विलीन हो गए।


 धर्मेंद्र जी 

जो परदे पर ही नहीं, हमारे हृदयों में भी सच्चे “ही-मैन” थे।

89 वर्ष की उम्र में भी उनका दिल अबोध बालक-सा था —

निर्मल, सजीव और सदा उत्साहित।


वे जितने बड़े सितारे थे, उतने ही ज़मीन से जुड़े इंसान भी।

अपनी धरती, अपने गांव, अपने माँ-बाबूजी की यादें

उनकी हर बात, हर मुस्कान में झलकती थीं।


कुछ ही महीनों पहले उनसे मिलने का सौभाग्य मिला —

वह एक आत्मीय, अविस्मरणीय मुलाकात थी।

लगभग एक घंटे तक हम बातें करते रहे —

उन्होंने अपनी कविताएँ सुनाईं, मैंने अपनी रचनाएँ साझा कीं। उन्होंने एक बहुत दिल को छू लेने वाला किस्सा बताया कि "जब उनके बाबूजी मुंबई में उनके पास आए, एक शाम बगीचे के एक पेड़ के नीचे (जो कि आज भी उनके घर में मौजूद है)  बैठे थे और मैं जब काम से आया तो मैंने उनसे पूछा बाबूजी ऐसे क्यों बैठे हो, आपको कुछ चाहिए, तो उन्होंने कहा नहीं बेटा मुझे कुछ नहीं चाहिए। फिर मैंने पूछा  बाबूजी बताइए ना क्या बात है, तब उन्होंने एक ही बात कही बेटा मुझे सिर्फ तुम्हारा थोड़ा समय चाहिए और बाबूजी की यह बात मेरे दिल को छू गई और उसके बाद मैं कोशिश करने लगा कि जल्दी से जल्दी रोज घर जाऊं और बाबूजी के पास कुछ देर बैठूं।"

यह बात बताते हुए

उनकी आँखों में चमक थी, जैसे एक बच्चा अपने सपनों में रंग भर रहा हो।

उनकी सादगी, विनम्रता और आत्मीयता ने वह पल

यादों की माला में सदा के लिए पिरो दिया,

जो जीवन के हर पल को महकाता रहेगा।


वह क्षण और भी अनमोल बन गया,

जब उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा —


> “आज मेरी बहन मुझसे मिलने आई है,

मेरी बहन के चेहरे पर कितनी चमक, कितनी मासूमियत है।”


यह सुनना मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था।

यह कहते हुए उनके चेहरे पर स्वागत भरी मुस्कान थी,

उन्होंने अनेक प्रकार के नाश्ते मंगवाकर रखे थे —

उनकी यह आत्मीयता, यह अपनापन, सचमुच दिल को छू गया।


धर्मेंद्र जी ने हमें सिखाया 


> “सच्चा बल शरीर में नहीं, आत्मा में होता है।”


उनकी फिल्मों के संवाद तो अमर हैं ही,पर असली संवाद तो उनका जीवन था —

जहाँ प्रेम, आदर और विनम्रता ही अभिनय की आत्मा थे।

उनके जाने से जैसे सिनेमा का एक युग विदा हो गया, पर उनके कर्म, उनका सृजन और उनका स्नेह

हम सबके हृदयों में सदा जीवित रहेंगे।

शत-शत नमन धर्मेंद्र जी — हमारे सच्चे ही-मैन,

आपकी कला, आपकी आत्मा और आपकी सादगी अमर रहे।

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